पराम्बा शक्तिपीठ ने दलित बस्तियों में कराया महाभंडारा

सनातन संस्कृति की सेवा परंपरा का अद्भुत उदाहरण: पराम्बा शक्तिपीठ ने दलित बस्तियों में कराया महाभंडारा

अन्न-वस्त्र वितरण से दिया समरसता का संदेश

 ‘नर सेवा ही नारायण सेवा है’, समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा पहुंचाना ही सनातन धर्म का वास्तविक स्वरूप : चंचल बाबा

दिग्विजय भारद्वाज / गरीब दर्शन/मोतिहारी।

सनातन धर्म की महान परंपरा केवल मंदिरों में पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव सेवा, करुणा, समरसता और परोपकार उसके मूल आधार हैं। इसी सनातन भावना को साकार करते हुए पूर्वी चंपारण के अंबिका नगर स्थित पराम्बा शक्तिपीठ द्वारा शनिवार को महाराज जी के नेतृत्व में खरवा पुल के समीप स्थित विभिन्न दलित बस्तियों में विशाल सेवा अभियान चलाया गया। इस दौरान सैकड़ों की संख्या में महिलाओं, पुरुषों, बुजुर्गों एवं बच्चों को श्रद्धापूर्वक प्रसाद वितरित किया गया तथा जरूरतमंद परिवारों के बीच अन्न एवं अन्य आवश्यक सामग्री का वितरण किया गया। दलित बस्तियों में पहुंचे महाराज जी ने स्वयं लोगों का कुशलक्षेम जाना और सभी को प्रेमपूर्वक प्रसाद ग्रहण कराया। सेवा कार्य के दौरान पूरा वातावरण “हर-हर महादेव”, “जय श्रीराम” और “जय माता दी” के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने इसे सनातन धर्म की उस परंपरा का जीवंत स्वरूप बताया, जिसमें किसी भी प्रकार का जाति, वर्ग अथवा आर्थिक भेदभाव नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर का स्वरूप देखने की शिक्षा दी जाती है। महाराज जी ने अपने संबोधन में कहा कि सनातन धर्म का मूल मंत्र ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ है। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक भोजन, वस्त्र, शिक्षा और सम्मान पहुंचाना ही सच्ची पूजा है। उन्होंने कहा कि जब तक समाज का कमजोर वर्ग सशक्त नहीं होगा, तब तक धर्म का उद्देश्य पूर्ण नहीं माना जा सकता।

उन्होंने कहा कि पराम्बा शक्तिपीठ वर्षों से गरीब, असहाय एवं दलित परिवारों के बीच सेवा कार्य कर रहा है। समय-समय पर अन्न-वस्त्र वितरण, निशुल्क भंडारा, धार्मिक अनुष्ठान, आध्यात्मिक प्रवचन, गौ सेवा, वृक्षारोपण एवं सामाजिक जागरूकता जैसे अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। शक्तिपीठ का उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन करना नहीं, बल्कि समाज में प्रेम, समरसता, सेवा और संस्कारों का विस्तार करना है।

गुरु पूर्णिमा महोत्सव बना आध्यात्मिक चेतना का केंद्र

उल्लेखनीय है कि हाल ही में पराम्बा शक्तिपीठ में गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर नौ दिवसीय भव्य आध्यात्मिक महोत्सव का आयोजन हुआ था। 19 जुलाई से प्रारंभ इस महोत्सव में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचे। श्री हनुमान आराधना, अष्टयाम रामधुन, संत सम्मेलन, विशाल महाभंडारा और गुरु पूजन जैसे कार्यक्रमों ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया।

महोत्सव का प्रमुख आकर्षण पराम्बा शक्तिपीठ सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित आध्यात्मिक पत्रिका “शक्ति संदेश” का लोकार्पण रहा। देश के विभिन्न भागों से पधारे संत-महात्माओं ने पत्रिका का विमोचन करते हुए इसे आध्यात्मिक चेतना और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।

संतों ने बताया गुरु का महत्व

संत सम्मेलन को संबोधित करते हुए पराम्बा शक्तिपीठाधीश्वर चंचल बाबा ने कहा कि जीवन में सफलता का कोई भी मार्ग गुरु के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। गुरु केवल ज्ञान नहीं देते, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी दिव्य शक्ति को जागृत कर उसे सत्य और धर्म के मार्ग पर अग्रसर करते हैं।

इलाहाबाद से पधारे प्रसिद्ध रामकथा वाचक राम अनुग्रह रामायणी जी ने कहा कि शास्त्रों में गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ स्थान दिया गया है, क्योंकि गुरु ही अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। उन्होंने रामचरितमानस एवं अन्य धर्मग्रंथों के उदाहरणों के माध्यम से गुरु महिमा का विस्तार से वर्णन किया।

देशभर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने निभाई सेवा की जिम्मेदारी

शनिवार को आयोजित सेवा कार्यक्रम में शैलेंद्र कुमार तिवारी (टुना तिवारी), धनबाद से आए शिष्यगण, लखनऊ से पधारे अनुपम जी सहित विभिन्न राज्यों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह के साथ सेवा कार्य किया। सभी ने भोजन वितरण, प्रसाद सेवा और व्यवस्था संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रद्धालुओं ने कहा कि गरीबों की सेवा ही सबसे बड़ा यज्ञ है और इसी भावना से सभी ने कार्यक्रम में अपनी सहभागिता सुनिश्चित की।

समाज को दिया समरसता और सेवा का संदेश

स्थानीय लोगों ने पराम्बा शक्तिपीठ की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि आज जब समाज विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे समय में सेवा, सद्भाव और सामाजिक समरसता का यह अभियान प्रेरणादायी है। दलित बस्तियों में पहुंचकर सम्मानपूर्वक सेवा करना सनातन धर्म की उस महान परंपरा का परिचायक है, जो हर व्यक्ति में ईश्वर का अंश देखती है।

पराम्बा शक्तिपीठ के लगातार चल रहे धार्मिक, आध्यात्मिक और जनकल्याणकारी कार्यक्रम यह संदेश दे रहे हैं कि सनातन धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि सेवा, करुणा, त्याग, समर्पण और मानव कल्याण की जीवनशैली है। शक्तिपीठ की यह पहल क्षेत्र में सामाजिक समरसता, आध्यात्मिक जागरण और भारतीय संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक प्रेरणादायी उदाहरण बनती जा रही है।

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *