दहेज के खिलाफ उठी इस्लाहे मुआशरा कमेटी की आवाज़ खामोश क्यों ?
वर्चस्व की लड़ाई में गुम हो गई समाज सुधार की मुहिम
तुराब खान /कैमूर/भभुआ :
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में गंगा किनारे के इलाकों से लेकर बिहार के कैमूर जिले की पहाड़ी तलहटी तक मुस्लिम समाज में दहेज प्रथा जैसी सामाजिक बुराई को खत्म करने के उद्देश्य से गठित इस्लाहे मुआशरा कमेटी कमसारोबार, गंगा पार व कर्मनाशा पार की मौजूदा स्थिति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कभी गांव-गांव जाकर सामाजिक जागरूकता फैलाने और शादियों में फिजूलखर्ची रोकने की मुहिम चलाने वाले इस संगठन की सक्रियता अब चर्चा का विषय बनी हुई है।
एक दौर था, जब इस कमेटी से जुड़े लोग दहेज की मांग, शादियों में अनावश्यक खर्च और गैरजरूरी रस्मों के खिलाफ आवाज बुलंद करते थे। समाज में सादगीपूर्ण विवाह को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही थी। इस पहल से लोगों में उम्मीद जगी थी कि बेटियों की शादी परिवारों पर आर्थिक बोझ बनने के बजाय सादगी और सम्मान के साथ संपन्न होगी।
इस्लामी शिक्षाओं में निकाह को आसान बनाने, सादगी अपनाने और दिखावे से बचने पर जोर दिया गया है। इसके बावजूद आज शादियों में बढ़ती फिजूलखर्ची, महंगी सजावट और विभिन्न रस्मों पर होने वाले खर्च को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हल्दी जैसी रस्मों का बढ़ता चलन भी चर्चा में है। सामाजिक जानकारों का मानना है कि शादी-ब्याह को प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बनाने के बजाय इसे सादगीपूर्ण और आर्थिक रूप से सहज बनाने की जरूरत है।
*लेकिन सवाल है कि आखिर दहेज के खिलाफ चलने वाली यह मुहिम कहां खो गई?*
चर्चाओं में कमेटी से जुड़े लोगों के बीच आपसी मतभेद, नेतृत्व को लेकर खींचतान और वर्चस्व की लड़ाई की बातें सामने आ रही हैं। हालांकि, इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि होना और संबंधित पक्षों का बयान सामने आना जरूरी है। यदि आपसी मतभेदों के कारण सामाजिक अभियान प्रभावित हुआ है, तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
सवाल किसी व्यक्ति या संगठन की आलोचना करने का नहीं, बल्कि उस मकसद को याद दिलाने का है, जिसके लिए इस कमेटी का गठन किया गया था। दहेज प्रथा के कारण आज भी कई परिवार आर्थिक दबाव झेलते हैं। ऐसे में समाज सुधार का बीड़ा उठाने वाले संगठनों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
अब आवाम जानना चाहती है कि इस्लाहे मुआशरा कमेटी कमसारोबार, गंगा पार व कर्मनाशा पार का भविष्य क्या है? क्या कमेटी फिर से गांव-गांव जाकर दहेज प्रथा, फिजूलखर्ची और शादी-ब्याह में दिखावे के खिलाफ अभियान चलाएगी? क्या इसके जिम्मेदार लोग आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर अपने सामाजिक दायित्वों को निभाएंगे, या फिर यह मुहिम केवल पुरानी याद बनकर रह जाएगी ?
समाज को आज भी इस्लाहे मुआशरा यानी सामाजिक सुधार की जरूरत है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि कमेटी से जुड़े लोग अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे और दहेजमुक्त, सादगीपूर्ण विवाह की मुहिम को दोबारा मजबूती से आगे बढ़ाएंगे।

