भारत को अपना नेविगेशन सिस्टम क्यों चाहिए

भारत को अपना नेविगेशन सिस्टम क्यों चाहिए ? आत्मनिर्भरता और रक्षा की बड़ी जरूरत

गरीब दर्शन / मारुत नंदन कुमार

आज मोबाइल पर रास्ता खोजना हो, समुद्र में जहाज की स्थिति जाननी हो या किसी वाहन की लोकेशन देखनी हो, कुछ ही सेकंड में जानकारी मिल जाती है। लेकिन इस सुविधा के पीछे काम करने वाली तकनीक कितनी महत्वपूर्ण है, इस पर कम ही लोग ध्यान देते हैं। खासकर तब, जब सवाल देश की सुरक्षा और अपनी जरूरतों के लिए स्वतंत्र तकनीकी व्यवस्था विकसित करने का हो।

भारत इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाने की तैयारी में है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) 30 अक्टूबर को रात 11 बजकर 51 मिनट पर श्रीहरिकोटा से GSLV-F18 रॉकेट के जरिए NVS-03 नेविगेशन उपग्रह प्रक्षेपित करने वाला है। यह भारत की अपनी नेविगेशन प्रणाली NavIC को मजबूत करने के प्रयास का हिस्सा है। इस उपग्रह में स्वदेशी परमाणु घड़ी सहित कई महत्वपूर्ण उपकरण लगाए गए हैं, जिनका उद्देश्य नेविगेशन सेवाओं की क्षमता और निरंतरता को बेहतर बनाना है।

सवाल उठता है कि जब अमेरिका की GPS प्रणाली पहले से दुनिया भर में इस्तेमाल हो रही है, तो भारत को अपनी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत क्यों है?

इसका जवाब केवल मोबाइल पर रास्ता दिखाने तक सीमित नहीं है। GPS अमेरिका द्वारा संचालित प्रणाली है, जबकि NavIC को भारत और उसके आसपास के क्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। अपनी प्रणाली होने से भारत को महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए एक स्वतंत्र विकल्प मिलता है। अंतरराष्ट्रीय तनाव या किसी असाधारण परिस्थिति में बाहरी तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता रणनीतिक चिंता बन सकती है। इसलिए अपना भरोसेमंद विकल्प तैयार करना केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित का विषय भी है।

रक्षा क्षेत्र में इस तकनीक का महत्व और बढ़ जाता है। आधुनिक सैन्य व्यवस्था में सटीक स्थिति और समय की जानकारी विमानों, जहाजों तथा अन्य सैन्य इकाइयों के बीच समन्वय बनाने में मदद करती है। समुद्री सीमाओं की निगरानी से लेकर सैन्य गतिविधियों के संचालन तक, भरोसेमंद नेविगेशन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। NavIC में आम उपयोगकर्ताओं के लिए मानक सेवा और अधिकृत रणनीतिक उपयोगकर्ताओं के लिए प्रतिबंधित सेवा की व्यवस्था भी है। संकट के समय किसी एक बाहरी प्रणाली पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपना विश्वसनीय विकल्प होना भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को मजबूत कर सकता है। हालांकि, कोई भी नेविगेशन प्रणाली अपने आप रक्षा क्षमता की गारंटी नहीं देती। इसके लिए सुरक्षित संचार, प्रशिक्षित कर्मियों और मजबूत तकनीकी ढाँचे की भी जरूरत होती है।

इस प्रणाली का लाभ केवल सेना तक सीमित नहीं है। मछुआरों को समुद्र में अपनी स्थिति जानने, परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाने, रेलगाड़ियों की निगरानी और आपदा के समय राहत दलों को सही स्थान तक पहुँचाने में भी नेविगेशन तकनीक उपयोगी हो सकती है। इस तरह अंतरिक्ष में विकसित तकनीक का लाभ आम नागरिकों तक पहुँच सकता है।

लेकिन आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल उपग्रह प्रक्षेपित करना नहीं है। जनवरी 2025 में प्रक्षेपित NVS-02 अपनी निर्धारित अंतिम कक्षा तक नहीं पहुँच पाया था। जुलाई 2026 में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, NavIC के तीन उपग्रह परिचालन में थे, जबकि स्वतंत्र स्थिति-निर्धारण सेवा के लिए कम-से-कम चार उपग्रहों की आवश्यकता बताई गई थी। उस समय समय-संबंधी सेवा उपलब्ध थी, लेकिन स्वतंत्र स्थिति-निर्धारण सेवा की सीमाएँ बनी हुई थीं। इसलिए NVS-03 का मिशन महत्वपूर्ण है, पर इसे अंतिम मंजिल नहीं माना जा सकता। उपग्रह का सही कक्षा में पहुँचना, उपकरणों का सफल संचालन और सेवाओं का लगातार भरोसेमंद बने रहना भी उतना ही जरूरी है।

भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी क्षमता स्थापित की है। अब चुनौती यह है कि इस क्षमता को ऐसी व्यवस्था में बदला जाए, जो देश की जरूरतों को लगातार पूरा कर सके। तकनीकी आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से दूरी बनाना नहीं, बल्कि अपनी जरूरतों के लिए सक्षम और भरोसेमंद विकल्प तैयार करना है।

अंतरिक्ष में उपग्रह भेजना वैज्ञानिक क्षमता का प्रमाण है; उस तकनीक को देश की सुरक्षा और नागरिकों के हित में लगातार उपयोगी बनाए रखना ही आत्मनिर्भर भारत की असली कसौटी है।

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