आरके सिन्हा के निधन से बिहार ने खोया अपना कर्मयोगी
संघर्ष की जमीन से राष्ट्रीय पहचान तक का सफर
गरीब दर्शन / रितु रंजन कुमार
भारतीय राजनीति, पत्रकारिता और उद्योग जगत ने 30 अक्टूबर को एक ऐसी शख्सियत खो दी, जिसने अपने संघर्ष, दूरदर्शिता और संगठनात्मक क्षमता के बल पर कई क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई। सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (एसआईएस) समूह के संस्थापक, भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद रविन्द्र किशोर सिन्हा (आरके सिन्हा) ने 30 अक्टूबर 2026 को अंतिम सांस ली। उनके निधन से बिहार ने अपना एक ऐसा व्यक्तित्व खो दिया, जिसने प्रदेश की पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन संघर्ष से सफलता तक की ऐसी यात्रा रहा, जिसमें पत्रकारिता, उद्यमिता, सामाजिक सेवा और राजनीति के कई अध्याय जुड़े हुए हैं। 22 सितंबर 1951 को जन्मे आरके सिन्हा की शुरुआती शिक्षा पटना में हुई। राजनीति विज्ञान और कानून की पढ़ाई के बाद उन्होंने पत्रकारिता को अपना पेशा बनाया। अपराध और राजनीतिक घटनाक्रमों की रिपोर्टिंग के साथ उन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध को भी युद्ध संवाददाता के रूप में कवर किया। पत्रकारिता के दौरान उनका जुड़ाव सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से गहरा हुआ। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचारों और संपूर्ण क्रांति आंदोलन ने उनके व्यक्तित्व को विशेष दिशा दी। उन्होंने उस दौर के छात्र आंदोलन और राजनीतिक चेतना को करीब से देखा और समझा।
आरके सिन्हा के पारिवारिक जीवन में उनकी पत्नी रीता किशोर सिन्हा का महत्वपूर्ण स्थान रहा। उनके परिवार में एक बेटा ऋतुराज किशोर सिन्हा और एक बेटी रिवोली सिन्हा हैं। बेटे ऋतुराज किशोर सिन्हा ने पिता की व्यावसायिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए एसआईएस समूह में प्रबंध निदेशक की जिम्मेदारी संभाली। वे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सचिव के रूप में भी सक्रिय हैं। बेटी रिवोली सिन्हा भी एसआईएस समूह से जुड़ी रहीं और कंपनी में गैर-कार्यकारी निदेशक की भूमिका निभाई। इस प्रकार आरके सिन्हा ने अपने परिवार को भी संस्थान निर्माण और सामाजिक दायित्वों की परंपरा से जोड़ा। उनके जाने के बाद पत्नी और बच्चों पर न केवल एक प्रियजन को खोने का दुख है, बल्कि उस विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी है, जिसे उन्होंने दशकों के परिश्रम से खड़ा किया। आरके सिन्हा के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब उन्होंने नौकरी की सीमाओं से आगे बढ़कर उद्यमिता का रास्ता चुना। वर्ष 1974 में उन्होंने सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (एसआईएस) की स्थापना की। उस समय देश में निजी सुरक्षा सेवाओं का क्षेत्र संगठित स्वरूप में विकसित नहीं हुआ था। दूसरी ओर, बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक रोजगार की तलाश में थे। सिन्हा ने इस आवश्यकता को अवसर में बदला। उनका उद्देश्य केवल व्यावसायिक संस्थान खड़ा करना नहीं, बल्कि देश की सेवा कर चुके सैनिकों को सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराना भी था। एक छोटे प्रयास से शुरू हुआ एसआईएस आज देश के प्रमुख निजी सुरक्षा सेवा समूहों में शामिल है। सुरक्षा सेवाओं से आगे बढ़कर इस समूह ने मानव संसाधन और व्यावसायिक सहायता के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। भारत के साथ ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तक इसका विस्तार हुआ। इस उपलब्धि का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष रोजगार सृजन रहा। हजारों युवाओं और पूर्व सैनिकों को आजीविका का अवसर मिला। उन्होंने साबित किया कि उद्यमिता का वास्तविक अर्थ केवल लाभ अर्जित करना नहीं, बल्कि समाज की जरूरतों को पहचानकर रोजगार और संस्थानों का निर्माण करना भी है। राजनीतिक जीवन में आरके सिन्हा की यात्रा भी उल्लेखनीय रही। उनका जुड़ाव भारतीय जनसंघ के दौर से था। वर्ष 1966 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के संपर्क ने उनकी वैचारिक और संगठनात्मक यात्रा को नई दिशा दी। बाद में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के समय वे उसके शुरुआती सदस्यों में शामिल रहे। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व वाले दौर में उन्होंने संगठन के विस्तार और विचारधारा को जनमानस तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाई। भाजपा की राजनीति में उनकी पहचान केवल एक उद्योगपति या प्रभावशाली नेता की नहीं थी। वे उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसने पार्टी के शुरुआती संघर्ष और संगठन निर्माण के दौर को करीब से देखा था। आज भाजपा देश की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्तियों में शामिल है, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे उन कार्यकर्ताओं का भी योगदान है, जिन्होंने दशकों तक संगठन को मजबूत करने के लिए काम किया। आरके सिन्हा इसी पीढ़ी का महत्वपूर्ण चेहरा थे।
वर्ष 2014 में भाजपा ने उन्हें बिहार से राज्यसभा भेजा। वर्ष 2014 से 2020 तक उच्च सदन में रहते हुए उन्होंने संसदीय जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। गृह, विदेश और श्रम एवं रोजगार जैसे विषयों से जुड़ी संसदीय समितियों में भी उनकी भूमिका रही। संसद में उनकी उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि वे उद्योग जगत के अनुभव को सार्वजनिक जीवन और नीति निर्माण से जोड़ने की क्षमता रखते थे।
उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक सरोकार भी था। शिक्षा, कौशल विकास, युवाओं को रोजगार, पूर्व सैनिकों के पुनर्वास और जरूरतमंदों की सहायता जैसे विषय उनके कार्यक्षेत्र में शामिल रहे। उनका मानना था कि शिक्षा और रोजगार ही आत्मनिर्भर समाज की मजबूत बुनियाद हैं। यही कारण था कि उन्होंने अपने व्यावसायिक विस्तार के साथ सामाजिक जिम्मेदारियों को भी महत्व दिया।
आरके सिन्हा के निधन के बाद भाजपा के सामने अपनी उस पीढ़ी की विरासत को सहेजने की जिम्मेदारी भी है, जिसने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने में अपना जीवन लगाया। राजनीति में पद और प्रतिष्ठा समय के साथ बदलते रहते हैं, लेकिन विचार, निष्ठा और संगठन के प्रति समर्पण की स्मृतियां लंबे समय तक जीवित रहती हैं।
पत्रकारिता से उद्योग, उद्योग से सामाजिक सेवा और सामाजिक जीवन से संसद तक का उनका सफर अनेक पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा। बिहार की मिट्टी से निकलकर राष्ट्रीय पहचान बनाने वाले आरके सिन्हा अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा स्थापित संस्थान, रोजगार से जुड़े हजारों परिवार और भाजपा के संगठनात्मक इतिहास में उनकी भूमिका उनके योगदान की गवाही देते रहेंगे।

