युवाओं के सशक्तिकरण का संकल्प भाषण से आगे बढ़े प्रयास
रितु रंजन कुमार
भारतीय जनसंघ के संस्थापक की 125वीं स्मरण पक्ष के अवसर पर आयोजित छात्र-छात्रा सम्मेलन में युवाओं की भूमिका, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण पर जो विचार रखे गए, वे आज के समय में प्रासंगिक हैं। किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा शक्ति पर निर्भर करता है और भारत जैसे युवा देश के लिए यह विषय और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार, जागरूक और सक्षम नागरिक तैयार करना भी है। आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), ड्रोन, रोबोटिक्स और डिजिटल तकनीक के दौर से गुजर रही है, तब भारतीय युवाओं के सामने अवसर भी हैं और चुनौतियां भी। ऐसे में कौशल विकास, नवाचार और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।
केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं—राष्ट्रीय शिक्षा नीति, कौशल विकास, स्टार्टअप, मुद्रा, डिजिटल इंडिया और खेलो इंडिया का उद्देश्य युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। इन योजनाओं की सफलता का वास्तविक पैमाना तब होगा, जब इनका लाभ अंतिम पंक्ति तक खड़े छात्र-छात्राओं और बेरोजगार युवाओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचे। केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका पारदर्शी और परिणामकारी क्रियान्वयन भी उतना ही आवश्यक है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन राष्ट्रहित, शिक्षा और जनसेवा के मूल्यों से जुड़ा रहा। उनके विचारों से प्रेरणा लेना तभी सार्थक होगा, जब युवा ज्ञान, अनुशासन, सामाजिक उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक मूल्यों को अपने जीवन में अपनाएं। साथ ही राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे युवाओं को केवल चुनावी शक्ति नहीं, बल्कि नीति निर्माण और सामाजिक परिवर्तन का सक्रिय भागीदार बनाएं।
भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। यदि इस ऊर्जा को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, रोजगार और नवाचार से जोड़ा जाए तो देश वैश्विक नेतृत्व की दिशा में और मजबूत कदम बढ़ा सकता है। इसलिए युवाओं के नाम दिए जाने वाले संदेशों के साथ-साथ उनके लिए ठोस अवसर और बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित करना भी समान रूप से आवश्यक है।

