वैवाहिक जीवन के 23 वर्ष पूरे होने पर लगाए फलदार पेड़
शिक्षक परिवार की बेटी समाज को दे रही है हरियाली और शिक्षा की प्रेरणा
गरीब दर्शन / मोतिहारी – आज के समय में जब वैवाहिक सालगिरह पर लोग भव्य आयोजन और महंगे उपहारों को प्राथमिकता देते हैं, ऐसे में मोतिहारी अंबिका नगर की सरिता भारद्वाज ने एक बार फिर समाज के सामने संवेदनशीलता, पर्यावरण प्रेम और सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल पेश की है। उन्होंने अपनी शादी की 23वीं सालगिरह पर दो फलदार पौधे लगाकर न सिर्फ धरती को उपहार दिया, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए एक सशक्त संदेश भी दिया कि हर खुशी के मौके पर प्रकृति को याद करें और उसे सहेजें। सरिता भारद्वाज की शादी 17 अप्रैल 2002 को हुई थी। तब से हर वर्ष अपनी सालगिरह पर वह पौधे लगाती आ रही हैं। आज तक उन्होंने पूर्वी चंपारण जिले के कई हिस्सों में जहां कार्यरत रहीं, सैकड़ों पौधे लगाए हैं, जिनमें कई अब फल देने लगे हैं। यह कार्य उन्होंने बिना किसी प्रचार-प्रसार के नि:स्वार्थ भाव से किया, लेकिन उनके इस शांत-सद्भावनापूर्ण अभियान ने समाज में हरियाली का सुंदर संदेश फैलाया है। शिक्षा और संस्कारों की नींव उन्हें विरासत में मिली है। उनके पिता एक शिक्षक रहे हैं, और भाई- बहन भी शिक्षक हैं। एक ऐसे परिवार से आने वाली सरिता ने जीवन भर ज्ञान, सेवा और संस्कार को ही अपना ध्येय माना है। वर्तमान में वे एक निजी विद्यालय की प्राचार्या हैं और अपने कार्यों से समाज को शिक्षित करने के साथ- साथ पर्यावरण के प्रति भी जागरूक कर रही हैं। उन्होंने अपने घर की छत पर ऑर्गेनिक खेती शुरू की है, जहाँ वे बिना रसायन के सब्जियां और फल उगाती हैं। उनका प्रकृति प्रेम केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि पूर्णतः व्यवहारिक और सतत प्रयासों से जुड़ा हुआ है।पति दिग्विजय भारद्वाज हमेशा उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं और हर पहल में उनका उत्साहवर्धन करते हैं। दोनों मिलकर जरूरतमंद, आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देते हैं। सरिता खुद संस्कृत साहित्य में पीजी कर शोधरत हैं, और उनका मानना है कि शिक्षा और संस्कृति दोनों को जोड़कर ही समाज में सच्चा परिवर्तन लाया जा सकता है। तीन बच्चों की मां दो बेटियाँ और एक बेटा सरिता न सिर्फ परिवार की नींव को सुदृढ़ बनाए रखी हैं, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणादायक महिला बनकर उभरी हैं।उनका कहना है,“यदि हर खुशी के अवसर पर एक पौधा लगाया जाए और हर जरूरतमंद बच्चे को थोड़ा भी सहयोग मिले, तो समाज में बहुत बड़ा बदलाव संभव है।” आज उनके इस अनूठे संकल्प की पूरे क्षेत्र में सराहना हो रही है। सरिता भारद्वाज जैसे लोग यह सिद्ध करते हैं कि एक शिक्षक केवल कक्षा तक सीमित नहीं होता,वह पूरे समाज का निर्माता होता है, और हर महिला, अगर चाहे, तो घर और समाज दोनों को संवार सकती है। सरिता भारद्वाज एक नाम नहीं, एक प्रेरणा है।


