मणिकामन आर्द्रभूमि पानी बोओ पानी उगाओ

“मणिकामन आर्द्रभूमि: पानी बोओ, पानी उगाओ” – मुशहरी, मुजफ्फरपुर का वैज्ञानिक, भूगर्भीय और जल पंचायत आधारित मॉडल

गरीब दर्शन / अजय सहाय जल योद्धा

मुजफ्फरपुर जिले के मुशहरी प्रखंड स्थित मणिकामन आर्द्रभूमि को “पानी बोओ, पानी उगाओ” की अवधारणा का जीवंत उदाहरण माना जा सकता है, क्योंकि यहाँ वर्षा जल को केवल रोका नहीं गया बल्कि धरती में इस प्रकार उतारा गया कि भविष्य में वही जल भूजल, हरियाली, मिट्टी की नमी और जल उपलब्धता के रूप में वापस मिले। भारत में हर वर्ष लगभग 4000 अरब घन मीटर वर्षा होती है, किंतु इसका बड़ा भाग तेज बहाव के साथ नदियों से समुद्र की ओर चला जाता है, जबकि सीमित मात्रा ही धरती के भीतर जाकर भूजल बन पाती है। यही कारण है कि वर्षा अधिक होने के बावजूद अनेक क्षेत्रों में गर्मी के मौसम में जल संकट दिखाई देता है। मणिकामन आर्द्रभूमि में लगभग 75,000 फीट लंबी जल पुनर्भरण खाइयाँ बनाकर वर्षा जल को रोकने, फैलाने और धीरे-धीरे धरती में पहुँचाने का प्रयास किया गया। इसका उद्देश्य केवल पानी जमा करना नहीं था बल्कि पानी को धरती के भीतर “बोना” था ताकि भविष्य में वही जल “उग” सके। यह मॉडल इस विचार पर आधारित है कि पानी को तेज़ी से बहाकर नष्ट नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे धीरे-धीरे मिट्टी और धरती की भीतरी परतों में प्रवेश कराना चाहिए। मणिकामन आर्द्रभूमि लगभग 51 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली एक प्राकृतिक जल धारण भूमि है, जहाँ जलोढ़ मिट्टी, महीन रेत, जैविक गाद और समतल भूमि वर्षा जल को धीरे-धीरे नीचे ले जाने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती है। उत्तर बिहार के मैदानों में मिट्टी की छिद्रता अधिक होती है, अर्थात यदि पानी कुछ समय तक ठहरा रहे तो वह मिट्टी की परतों से रिसते हुए भूजल भंडार तक पहुँच सकता है। यही कारण है कि यहाँ बनाई गई जल पुनर्भरण खाइयाँ अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाती हैं। इन खाइयों का कार्य वर्षा जल के बहाव की गति कम करना, उसे लंबे समय तक ठहराना और मिट्टी में समाने का अवसर देना है। जब वर्षा का पानी इन खाइयों में भरता है, तब वह एकदम से आगे नहीं भागता बल्कि धीरे-धीरे आसपास की मिट्टी और धरती की भीतरी परतों में उतरने लगता है। यही प्रक्रिया “पानी बोने” का वैज्ञानिक स्वरूप है। बाद में यही पानी भूजल के रूप में कुओं, हैंडपंपों, मिट्टी की नमी, पेड़-पौधों की हरियाली और आसपास के जल स्रोतों में दिखाई देता है, जिसे “पानी उगाना” कहा जा सकता है। आर्द्रभूमि प्रकृति का सबसे श्रेष्ठ जल घटक मानी जाती है क्योंकि यह पानी को बाँधकर नहीं रखती बल्कि स्पंज की तरह सोखती है और धीरे-धीरे धरती में छोड़ती रहती है। इसी कारण आर्द्रभूमि को “प्रकृति की किडनी” भी कहा जाता है, क्योंकि यह जल को स्वच्छ करने, गाद रोकने, बाढ़ के समय अतिरिक्त जल रोकने, जैव विविधता को बढ़ाने और भूजल बढ़ाने का कार्य करती है। मणिकामन आर्द्रभूमि में बनाई गई पुनर्भरण खाइयाँ वर्षा जल को तेजी से बहने नहीं देतीं बल्कि उसे रुककर धरती में जाने का अवसर देती हैं। यदि इस क्षेत्र में लगभग 1100 मिलीमीटर वर्षा होती है तो करोड़ों लीटर वर्षा जल यहाँ गिरता है। यदि इसका बड़ा भाग धीरे-धीरे मिट्टी में समा जाए तो भूजल में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। यहाँ की जलोढ़ मिट्टी, महीन रेत, छोटी-छोटी प्राकृतिक दरारें और भूमि की संरचना वर्षा जल को धरती के भीतर ले जाने में सहायता करती हैं। यह वही सिद्धांत है जिस पर पुराने समय में आहर, पइन, तालाब, चौर और कुएँ आधारित जल व्यवस्था काम करती थी। मणिकामन आर्द्रभूमि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ जल केवल सतह पर जमा नहीं होता बल्कि धरती के भीतर प्राकृतिक जल भंडार के रूप में सुरक्षित होता है। इसीलिए इसे “पानी बोने” और “पानी उगाने” का उत्कृष्ट उदाहरण कहा जा सकता है। जल पंचायत की दृष्टि से यह मॉडल केवल खाई निर्माण का कार्य नहीं बल्कि सामुदायिक सहभागिता का उदाहरण भी है। जल पंचायत के माध्यम से किसान, महिलाएँ, बच्चे, युवा और पंचायत प्रतिनिधि मिलकर जल संवाद, जल लेखा, जल समीक्षा और जल संसद के माध्यम से यह समझ सकते हैं कि गाँव में कितना पानी गिरा, कितना धरती में गया और कितना भविष्य के लिए सुरक्षित हुआ। यदि हर वर्ष वर्षा का लेखा-जोखा रखा जाए, भूजल स्तर मापा जाए और खाइयों में पानी के ठहराव का समय समझा जाए तो यह गाँव स्तर का जल विज्ञान मॉडल बन सकता है। मणिकामन आर्द्रभूमि के किनारे लगाए गए नीम, पीपल और बरगद जैसे वृक्ष इस पूरी अवधारणा को और मजबूत बनाते हैं। इन वृक्षों की जड़ें मिट्टी को ढीला रखती हैं, जल को भीतर जाने के लिए मार्ग बनाती हैं और मिट्टी की जल धारण क्षमता को बढ़ाती हैं। नीम मिट्टी को कठोर होने से बचाता है, पीपल की फैली हुई जड़ें वर्षा जल को मिट्टी में समाने में सहायता करती हैं और बरगद की विस्तृत जड़ प्रणाली भूमि को स्थिर रखने के साथ-साथ पानी को नीचे पहुँचाने में मदद करती है। वृक्षों की छाया के कारण भूमि का तापमान कम रहता है, जिससे पानी का वाष्पीकरण घटता है और अधिक जल मिट्टी में सुरक्षित रह पाता है। यदि आर्द्रभूमि के किनारे हजारों नीम, पीपल और बरगद लगाए जाएँ तो वे केवल हरियाली नहीं बल्कि “जल उगाने वाले वृक्ष” सिद्ध हो सकते हैं। इस मॉडल की सबसे बड़ी दूरदर्शी सोच यह है कि आर्द्रभूमि को बेकार भूमि नहीं बल्कि “जीवित भूजल उत्पादन केंद्र” समझा जाए। सामान्य जलाशय केवल पानी रोकते हैं, जबकि आर्द्रभूमि पानी को धीरे-धीरे धरती में पहुँचाकर भूजल बनाती है। इसलिए कहा जा सकता है कि “आर्द्रभूमि प्रकृति का सबसे श्रेष्ठ घटक है जहाँ पानी बोया भी जाता है और पानी उगाया भी जाता है।” मणिकामन मॉडल यह संदेश देता है कि वर्षा की हर बूंद को खाइयों, आर्द्रभूमि, वृक्षारोपण, सामुदायिक भागीदारी और जल पंचायत से जोड़कर धरती में उतारा जाए। यदि बिहार की पंचायतें इस मॉडल को अपनाएँ तो बाढ़ का पानी संकट नहीं बल्कि भविष्य की जल संपदा बन सकता है। अंततः मणिकामन आर्द्रभूमि हमें यह सिखाती है कि पानी बोना केवल जल रोकना नहीं बल्कि उसे धरती के भीतर पहुँचाना है, और पानी उगाना केवल भूजल बढ़ाना नहीं बल्कि हरियाली, मिट्टी की नमी, जीव-जंतुओं का संरक्षण, जलवायु संतुलन और आने वाली पीढ़ियों की जल सुरक्षा सुनिश्चित करना है। “जहाँ आर्द्रभूमि, वहाँ भविष्य का पानी; जहाँ पुनर्भरण खाई, वहाँ भूजल; जहाँ नीम, पीपल और बरगद, वहाँ धरती में बोया गया पानी और वहीं से उगता आने वाले कल का जल” — यही मणिकामन आर्द्रभूमि का वैज्ञानिक, सामुदायिक और दूरदर्शी संदेश है।

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *