मां चंद्रघंटा की आराधना शक्ति साहस और शांति का संदेश

मां चंद्रघंटा की आराधना शक्ति साहस और शांति का संदेश

कुमकुम शर्मा

भारतीय संस्कृति में नवरात्र केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, साधना और आत्मशुद्धि का अवसर भी है। मां दुर्गा के नौ स्वरूप जीवन को अलग-अलग संदेश देते हैं। इनमें तीसरा स्वरूप मां चंद्रघंटा का है, जो साहस,म पराक्रम, शांति और कल्याण का प्रतीक माना जाता है। उनकी आराधना हमें यह प्रेरणा देती है कि जीवन की चुनौतियों का सामना निर्भीकता से किया जाए, लेकिन शक्ति के साथ विवेक, व्यवहार में विनम्रता और मन में करुणा भी बनी रहे।
मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, इसी कारण उन्हें यह नाम मिला। उनका स्वरूप तेजस्वी और दिव्य माना गया है। दस भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली देवी सिंह पर सवार हैं। उनका यह रूप अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का संदेश देता है। धार्मिक मान्यता है कि उनके घंटे की प्रचंड ध्वनि से दुष्ट शक्तियां भयभीत होती हैं और भक्तों को निर्भयता का आशीर्वाद मिलता है। उनके स्वरूप में जहां युद्ध के लिए तत्परता है, वहीं भक्तों के प्रति ममता और कल्याण की भावना भी विद्यमान है।
नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु मानते हैं कि उनकी कृपा से भय, बाधाओं और नकारात्मकता से मुक्ति मिलती है। आध्यात्मिक परंपरा में इस दिन की साधना को मणिपुर चक्र से भी जोड़ा जाता है, जिसे आत्मबल, इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास का केंद्र माना जाता है। इन मान्यताओं का व्यापक संदेश यह है कि मनुष्य अपने भीतर साहस और आत्मसंयम विकसित करे, ताकि कठिन परिस्थितियों में भी वह संतुलित निर्णय ले सके।
मां चंद्रघंटा का स्वरूप हमें शक्ति की सही परिभाषा भी समझाता है। शक्ति का अर्थ केवल विरोधी को परास्त करना नहीं, बल्कि अन्याय का प्रतिकार करना, निर्बलों की रक्षा करना और समाज में सद्भाव बनाए रखना भी है। वास्तविक साहस वही है, जो भय के सामने घुटने न टेके और सफलता मिलने पर अहंकार से दूर रहे। देवी का सौम्य और शांत रूप इस बात का प्रतीक है कि दृढ़ता और विनम्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। आज के सामाजिक परिवेश में मां चंद्रघंटा की आराधना का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। समाज में बढ़ती असहिष्णुता, हिंसा, भेदभाव और नैतिक मूल्यों के क्षरण के बीच जरूरी है कि व्यक्ति अपने भीतर साहस के साथ संवेदनशीलता भी विकसित करे। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना, महिलाओं का सम्मान करना, कमजोर वर्गों की सहायता करना और सत्य के मार्ग पर चलना देवी की आराधना को व्यवहार में उतारने के सार्थक उदाहरण हैं। पूजा तभी अधिक अर्थपूर्ण बनती है, जब उसके संस्कार हमारे आचरण में भी दिखाई दें। मां चंद्रघंटा की उपासना यह विश्वास जगाती है कि कठिनाइयों के बीच भी शांति और आशा का मार्ग खोजा जा सकता है। उनकी घंटाध्वनि को प्रतीकात्मक रूप से उस जागरण के रूप में भी देखा जा सकता है, जो मनुष्य को भय, आलस्य और अन्याय के विरुद्ध सचेत करता है। जब व्यक्ति अपने विचार, वाणी और कर्म में शुद्धता लाता है, तब उसका व्यक्तित्व भी तेजस्वी और आकर्षक बनता है। मां चंद्रघंटा का स्तुति मंत्र है—
“पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥”
इस मंत्र के माध्यम से भक्त देवी से कृपा, संरक्षण और कल्याण की प्रार्थना करते हैं। नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना करते हुए हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम साहस को सेवा से, शक्ति को सदाचार से और श्रद्धा को मानवीय संवेदना से जोड़ेंगे। यही देवी की उपासना का व्यापक संदेश है। मां चंद्रघंटा की कृपा से समाज में निर्भयता, सद्भाव और शांति का प्रकाश फैले, यही इस पावन पर्व की सार्थक कामना है।

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