चंपारण में लौटेगी चीनी की मिठास
पदूमकेर में चीनी मिल की मांग ने पकड़ा जोर
किसानों की किस्मत बदलने की ऐतिहासिक तैयारी
गरीब दर्शन/ मोतिहारी।
नील की खेती के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष से देश को आज़ादी की राह दिखाने वाली चंपारण की क्रांतिकारी धरती एक बार फिर इतिहास रचने की दहलीज पर खड़ी है। फर्क बस इतना है कि इस बार लड़ाई शोषण के खिलाफ नहीं, बल्कि किसानों के हक की मिठास लौटाने के लिए है। पूर्वी चंपारण के पताही प्रखंड अंतर्गत पदूमकेर में चीनी मिल की स्थापना की मांग अब केवल चर्चा नहीं रही, बल्कि यह जनभावना, किसान आंदोलन और आर्थिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुकी है। स्थानीय किसानों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का स्पष्ट मानना है कि यदि पदूमकेर में आधुनिक चीनी मिल स्थापित होती है, तो यह सिर्फ एक उद्योग नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की किस्मत बदलने वाला इंजन साबित होगा।पदूमकेर में चीनी मिल का विचार कोई नया नहीं है। दशकों पहले शिवहर के पूर्व सांसद और सीरिया में भारत के राजदूत रहे स्वर्गीय हरीकिशोर सिंह ने इस क्षेत्र में चीनी मिल की परिकल्पना की थी। उनका सपना था कि चंपारण का किसान अपने ही क्षेत्र में अपनी उपज का उचित मूल्य पाए। आज उसी अधूरे सपने को जमीन पर उतारने का संकल्प लिया है रूपनी गांव के निवासी एवं पैक्स अध्यक्ष विनय कुमार पांडेय उर्फ ‘टूना पांडेय’ ने। वे लगातार जनमत तैयार कर रहे हैं और सरकार को यह भरोसा दिला रहे हैं कि पदूमकेर की जमीन, जल और किसान तीनों मिल के लिए आदर्श हैं। “यह सिर्फ मिल की मांग नहीं है, यह किसानों के सम्मान और आत्मनिर्भरता की लड़ाई है,” पदूमकेर की सबसे बड़ी ताकत इसकी भौगोलिक स्थिति है। यह इलाका चार महत्वपूर्ण क्षेत्रों के संगम पर स्थित है,नेपाल बॉर्डर (बैरगनिया),ढाका, चकिया, शिवहर, इन सभी स्थानों की दूरी मात्र 10 से 15 किलोमीटर है। ऐसे में यदि यहां चीनी मिल स्थापित होती है, तो पताही, मधुबन, ढाका, शिवहर और सीतामढ़ी के सैकड़ों पंचायतों के किसान सीधे लाभान्वित होंगे। अब तक किसानों को गन्ना बेचने के लिए रीगा या मोतिहारी तक लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी, जिसमें समय, श्रम और परिवहन लागत तीनों का भारी नुकसान होता था। पदूमकेर में मिल खुलने से परिवहन खर्च लगभग शून्य होगा तथा भुगतान भी समय पर मिलने के साथ गन्ना उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा के बाद जिले के औद्योगिक विकास को नई रफ्तार मिली है। इसी कड़ी में जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल के नेतृत्व में जिला प्रशासन चीनी मिल स्थापना को लेकर पूरी तरह एक्शन मोड में नजर आ रहा है। एक मानक के तहत् चीनी मिल के लिए करीब 80 एकड़ भूमि की आवश्यकता होती है। प्रशासन को चकिया में 173 एकड़ भूमि सहित ढेकहां और घोड़ासहन में भी भूमि से जुड़े प्रस्ताव प्राप्त हो चुके हैं। डीएम कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि भूमि की समीक्षा के बाद इसी सप्ताह प्रस्ताव बिहार सरकार को भेज दिया जाएगा। यदि पदूमकेर का चयन होता है, तो यह क्षेत्र के लिए आर्थिक क्रांति से कम नहीं होगा। 90 के दशक तक मोतिहारी, चकिया और सुगौली की चीनी मिलें चंपारण की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थीं। इनके बंद होने से गन्ना किसानों की कमर टूट गई। हालांकि सुगौली में नई मिल शुरू होने से उम्मीद जगी है, लेकिन जिले की विशाल गन्ना उत्पादन क्षमता को देखते हुए पदूमकेर जैसे नए केंद्रों की नितांत आवश्यकता है। क्या साकार होगा सपना? टिकी हैं हजारों निगाहें,अब सवाल सिर्फ इतना है, क्या स्वर्गीय हरीकिशोर सिंह का सपना आखिरकार साकार होगा?। क्या चंपारण के खेतों में फिर से खुशहाली की मिठास घुलेगी ? फिलहाल, हजारों किसानों की उम्मीदें और निगाहें पटना से आने वाली अंतिम मुहर पर टिकी हैं। अगर फैसला पदूमकेर के पक्ष में जाता है, तो यह इलाका आने वाले वर्षों में उत्तर बिहार के सबसे बड़े कृषि-औद्योगिक केंद्र के रूप में उभरेगा।

