—संस्कृति
आधुनिकता और रील के दौर में भी जिंदा है माटी की झिझिया
राहुल गुप्ता,ब्युरो
गरीब दर्शन/हाजीपुर।
इंटरनेट और डीजे के शोर में भले ही लोकगीत धुंधले पड़ रहे हों, पर शारदीय नवरात्र आते ही वैशाली सहित पूरे तिरहुत-मिथिलांचल में एक परंपरा फिर जीवंत हो उठती है – झिझिया नृत्य-गीत। यह तिरहुत और मिथिलांचल का अत्यंत लोकप्रिय तांत्रिक पृष्ठभूमि वाला लोकनृत्य है, जिसके शब्द ठेठ बज्जिका में होते हैं। यह आश्विन मास में घटस्थापना से विजयादशमी तक लगातार दस रातों तक गाया-खेला जाता है।नवरात्र में शाम ढलते ही गांवों में दृश्य बदल जाता है। महिलाएं और युवतियां ब्रह्मस्थान पर जुटती हैं, सिर पर सैकड़ों छेद वाली मटकी रखती हैं, मटकी में दीया जलता रहता है। गोल घेरा बनाकर वे झिझिया नाचती हैं। तोहरे भरोसे हे ब्रह्म बाबा झिझिया बनइलो हो…. जैसे गीतों से पूरा गांव भक्तिमय हो उठता है। सिर पर जलती मटकी और पैरों की थाप देख दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। मान्यता है कि यह नृत्य मां दुर्गा को प्रसन्न करने और बच्चों-परिवार को बुरी नजर, तंत्र-मंत्र और काले जादू से बचाने के लिए किया जाता है। कहीं-कहीं इसे अच्छी फसल और बारिश के लिए इंद्र देव की प्रार्थना से भी जोड़ते हैं। यह गीत पूरी तरह पारंपरिक लोकधुन पर आधारित होती है। महिलाएं सामूहिक ताली जिसे ‘झिझरी बजाना’ कहते हैं, बजाती हैं। साथ में ढोलक, मंजीरा और झांझ की तेज थाप इसकी लय को रोमांचक बना देती है।
-अभिलेखीकरण जरूरी
पहले हर शाम ब्रह्मस्थान पर टोल बनाकर झिझिया गाई जाती थी, अब ग्रामीण इलाकों में यह तेजी से सिमट रही है। पारंपरिक गीत जानने वाली बुजुर्ग महिलाएं कम हो गईं और नई पीढ़ी की रुचि घटी है। कई जगह झिझिया के नाम पर ऑर्केस्ट्रा और अश्लील भोजपुरी गानों पर डांस परोसा जा रहा है, जिससे इसकी पवित्र पहचान खत्म हो रही है नाटककार व बज्जिका कवि अखौरी चंद्रशेखर कहते हैं कि बज्जिकांचल में झिझिया अभी मरी नहीं है, लेकिन स्कूलों और सांस्कृतिक समितियों को इसके गीत-धुन का अभिलेखीकरण कर नई पीढ़ी को प्रशिक्षण देना होगा, वरना यह सिर्फ फोटो-वीडियो तक सिमट जाएगी।

