शिक्षा का लक्ष्य डिग्री नहीं संवेदनशील इंसान का निर्माण
बिमल सर्राफ
शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्रियां हासिल करना, अच्छे अंक लाना और रोजगार पाना नहीं है। इसकी वास्तविक सार्थकता ऐसे इंसान के निर्माण में है, जिसके भीतर ज्ञान के साथ संवेदना, व्यवहार में विनम्रता और जीवन में मानवीय मूल्यों के प्रति सम्मान हो। डिग्री व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता बताती है, लेकिन उसका चरित्र उसकी वास्तविक शिक्षा का परिचय देता है। आज शिक्षा व्यवस्था में सफलता का पैमाना परीक्षा परिणाम, प्रतियोगी परीक्षाओं और अच्छे रोजगार तक सिमटता दिखाई देता है। माता-पिता से लेकर विद्यालयों तक बेहतर अंकों की होड़ है। इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन इस दौड़ में संस्कार, सहानुभूति और सामाजिक जिम्मेदारी पीछे छूट जाएं तो यह चिंता का विषय है। आखिर ऐसा शिक्षित समाज किस काम का, जहां व्यक्ति दूसरों का दर्द समझने और जरूरतमंद की मदद करने की संवेदना खो दे? शिक्षा की पहली पाठशाला परिवार है। बच्चे उपदेशों से अधिक अपने माता-पिता के व्यवहार से सीखते हैं। बड़ों का सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह और जरूरतमंदों की सहायता जैसे संस्कार घर से ही विकसित होते हैं। वहीं विद्यालय का दायित्व पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसे विद्यार्थियों में अनुशासन, ईमानदारी, सहिष्णुता, सहयोग और सामाजिक सद्भाव की भावना भी विकसित करनी चाहिए। आधुनिक तकनीक और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में मानवीय संवेदनाओं का महत्व और बढ़ गया है। समाज को ऐसे डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी और उद्यमी चाहिए, जो अपनी उपलब्धियों के साथ सामाजिक दायित्वों को भी समझें। सफलता का अर्थ दूसरों को पीछे छोड़ना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर आगे बढ़ना है। ज्ञान तभी सार्थक है, जब उसका उपयोग समाज और मानवता के हित में हो। शिक्षा व्यक्ति को ऊंचाइयों तक पहुंचाए, लेकिन उसे अपनी जड़ों और जिम्मेदारियों से दूर न करे। अंततः शिक्षा का मूल्य प्रमाणपत्रों से नहीं, बल्कि व्यक्ति के विचार, चरित्र और कर्मों से तय होना चाहिए। क्योंकि डिग्री किसी को शिक्षित होने का प्रमाण दे सकती है, लेकिन संवेदनशीलता ही उसे सच्चा इंसान बनाती है।

