मौत के सौदागरों का गढ़ बना सदर अस्पताल मोतिहारी

 

आईसीयू में डॉक्टर नदारद मरीज की जान केवल एक जीएनएम के भरोसे

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुली

गरीब दर्शन / मोतिहारी।

बिहार के सदर अस्पताल मोतिहारी में बुधवार की रात एक ऐसी हकीकत सामने आई जिसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के खोखलेपन को बेनकाब कर दिया। रात करीब 9:30 बजे बलुआ टाल निवासी बुजुर्ग महिला ललिता देवी को दिल का दौरा पड़ने पर गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया। डॉक्टरों और नर्सों की तैनाती वाले आईसीयू में भर्ती तो कर लिया गया, लेकिन अंदर जो हालात थे, उन्हें देखकर परिजन ही नहीं, वहां मौजूद अन्य लोग भी सन्न रह गए। आईसीयू में तीन एयर कंडीशनर लगे थे, लेकिन उनमें से केवल एक ही चल रहा था, वो भी बमुश्किल से, रुक रुक कर। ऑक्सीजन और अन्य लाइफ सपोर्ट उपकरणों की स्थिति बदहाल थी। मरीजों की निगरानी के लिए मॉनिटर तो लगे थे, पर कई उपकरण बंद पड़े थे। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब आईसीयू में कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। पूरी यूनिट एकमात्र जीएनएम (नर्सिंग स्टाफ) के भरोसे चल रही थी।गंभीर मरीजों के लिए बनाए गए, इस आईसीयू में न कोई सीनियर डॉक्टर, न कोई टेक्निकल एक्सपर्ट और न ही कोई जिम्मेदार अधिकारी ड्यूटी पर मौजूद था। अस्पताल में भर्ती ललिता देवी की जिंदगी उस रात सचमुच भगवान भरोसे थी।परिजनों ने सुबह स्थिति को सुधारने के लिए अस्पताल के कंट्रोल रूम के नम्बर 8544421334 पर कॉल किया, लेकिन वह बंद मिला। कई बार कोशिशों के बावजूद स्वास्थ्य विभाग, बिहार, मोतिहारी के सिविल सर्जन से 9470003180 पर संपर्क नहीं हो सका, उनका मोबाइल फोन लगातार “नॉट रीचेबल” बताता रहा। सवाल यह है कि जब ज़िला अस्पताल में कोई आपात स्थिति हो तो जनता आखिर किसके पास जाए। मौके पर उपस्थित मरीज के परिजन अरुण कुमार सिन्हा, निवासी श्री कृष्ण नगर, मोतिहारी, ने कहा कि ,“सरकारी अस्पताल में सारी सुविधाएं होने का दावा तो होता है, लेकिन हकीकत में कुछ भी काम नहीं कर रहा। आईसीयू में मरीज की निगरानी के लिए कोई डॉक्टर नहीं, उपकरण खराब और जिम्मेदार अधिकारी गायब। आखिर जनता कहां जाए? अगर यही हाल रहा तो लोग मजबूरन महंगे प्राइवेट अस्पतालों का सहारा लेंगे, जो हर किसी की पहुंच में नहीं।” स्थानीय नागरिकों ने कहा कि ,“यह सिर्फ एक मरीज की बात नहीं है। हर दिन इसी अस्पताल में सैकड़ों गरीब और मध्यमवर्गीय लोग अपनी आखिरी उम्मीद लेकर आते हैं। लेकिन यहां न डॉक्टर हैं, न जवाबदेही। जब लाइफलाइन ही मौत का अड्डा बन जाए तो सरकार की नीतियों और ज़मीनी हकीकत में फर्क साफ दिखाई देता है।” लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि जब राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवा को प्राथमिकता देने की बात करती है, तो ज़िला अस्पतालों में इस तरह की भयावह लापरवाही क्यों जारी है ? आईसीयू में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की अनुपस्थिति ने सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। उपकरणों की खराब स्थिति मरीजों के लिए जोखिम बन चुकी है।कंट्रोल रूम और सिविल सर्जन की अनुपलब्धता ने आपातकालीन व्यवस्था की सच्चाई उजागर कर दी। लाखों की लागत से बने आईसीयू का संचालन केवल एक जीएनएम के भरोसे किया जा रहा है, यह स्वास्थ्य तंत्र की सबसे बड़ी विफलता है। जनता की एकजुट मांग अब कार्रवाई जरूरी है। स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मरीजों के परिजनों ने एक स्वर में मांग की है कि आईसीयू में 24 घंटे डॉक्टरों और प्रशिक्षित टेक्निकल स्टाफ की तैनाती हो।सभी उपकरणों की जांच कर खराब मशीनों को तुरंत बदला जाए। कंट्रोल रूम और प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाए। दोषी अधिकारियों और जिम्मेदार कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई हो।जिला प्रशासन पूरे मामले में संज्ञान लेकर जनता को भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराए। अब समय है जागने का “स्वास्थ्य सेवा पर दया नहीं, अधिकार चाहिए”। यह मामला किसी एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की चेतावनी है। जब आम नागरिक का भरोसा सरकारी अस्पतालों से उठ जाएगा, तब विकास के सारे दावे खोखले साबित होंगे। जनता को भीख में नहीं , जीवनरक्षक स्वास्थ्य सेवा अधिकार के रूप में चाहिए। सरकार को अब तत्काल कदम उठाने होंगे,क्योंकि इलाज में देरी का मतलब है, ज़िंदगियों से खिलवाड़। “अगर व्यवस्था नहीं बदली तो सदर अस्पताल जैसे संस्थान जनता के लिए अस्पताल नहीं, बल्कि मौत का अड्डा बनते जाएंगे।

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