बिहार की मेहनत देश बनाती है बिहार में रोजगार कब बनेगा ?
मारुत नंदन कुमार / गरीब दर्शन –
बिहार का एक युवा जब रोजी-रोटी की तलाश में अपना घर छोड़ता है, तो उसके साथ केवल एक बैग नहीं जाता। उसके साथ माता-पिता की उम्मीदें, बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी और परिवार को बेहतर जिंदगी देने का सपना भी जाता है। दिल्ली की इमारतों, पंजाब के खेतों और गुजरात की फैक्ट्रियों में काम करने वाले बिहार के श्रमिक देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं। लेकिन एक सवाल आज भी बना हुआ है –जब बिहार के लोग दूसरे राज्यों के विकास में इतनी मेहनत करते हैं, तो अपने राज्य में उनके लिए पर्याप्त रोजगार के अवसर क्यों नहीं बन पा रहे हैं ?
बिहार से काम की तलाश में दूसरे राज्यों में जाना कोई नई बात नहीं है। दशकों से लोग बेहतर कमाई के लिए अपना गाँव, घर और परिवार छोड़ते आए हैं। उनके भेजे पैसों से घर का खर्च चलता है, बच्चों की फीस जमा होती है और माता-पिता का इलाज होता है। लेकिन इसके साथ परिवार से दूरी, बच्चों की परवरिश की चिंता और संकट के समय अकेले संघर्ष करने की मजबूरी भी जुड़ी होती है।
यह मानना भी सही नहीं होगा कि बाहर जाने वाला हर व्यक्ति मजबूरी में ही पलायन करता है। बेहतर वेतन, शिक्षा और करियर के अवसरों के लिए दूसरे शहर जाना स्वाभाविक है। असली समस्या तब पैदा होती है, जब अपने राज्य में पर्याप्त अवसर न होने के कारण किसी व्यक्ति को रोजी-रोटी के लिए घर से दूर रहना पड़ता है। बिहार के विकास की एक बड़ी कसौटी यह होनी चाहिए कि लोगों को बाहर जाने या अपने घर के पास काम करने के बीच वास्तविक विकल्प मिल सके।
15 अक्टूबर को मुजफ्फरपुर जिले के मोतीपुर प्रखंड स्थित महवल औद्योगिक क्षेत्र में 140.95 करोड़ रुपये की लागत से विकसित मेगा लेदर, फुटवियर एवं एक्सेसरीज क्लस्टर का उद्घाटन हुआ। मुख्यमंत्री ने राज्य के भीतर रोजगार बढ़ाने और दूसरे प्रदेशों में मजदूरी करने जाने वाले लोगों को बिहार में ही काम उपलब्ध कराने के लक्ष्य पर जोर दिया। उन्होंने रोजगार के लिए राज्य से बाहर जाने वाले लगभग 12 लाख लोगों का उल्लेख भी किया। यह संख्या मुख्यमंत्री के बयान के संदर्भ में देखी जानी चाहिए, न कि सभी प्रवासी श्रमिकों की प्रमाणित कुल संख्या के रूप में। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, महवल परियोजना से लगभग 2,100 लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये अवसर कितनी जल्दी और किस स्तर पर वास्तविक रोजगार में बदलते हैं।
बिहार को उद्योगों की जरूरत है, लेकिन केवल बड़ी फैक्ट्रियाँ स्थापित करना पर्याप्त नहीं होगा। मक्का, मखाना, फल-सब्जियों और डेयरी जैसे कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण, पैकेजिंग और भंडारण से भी स्थानीय रोजगार पैदा किया जा सकता है। छोटे कारोबार, पर्यटन, परिवहन और सेवा क्षेत्र को बढ़ावा देकर कस्बों और गाँवों में भी आजीविका के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। इसके लिए बेहतर बिजली, सड़क, बाजार, कौशल प्रशिक्षण और आसान वित्तीय सहायता जरूरी है।
रोजगार की चर्चा अक्सर सरकारी नौकरियों तक सीमित रह जाती है। सरकारी नौकरी महत्वपूर्ण है, लेकिन बिहार के सभी युवाओं को केवल इसी माध्यम से काम नहीं मिल सकता। निजी उद्योगों और छोटे उद्यमों को मजबूत करना होगा, ताकि युवा नौकरी पाने के साथ-साथ दूसरों के लिए भी रोजगार पैदा कर सकें। इसके लिए निवेश की घोषणाओं के साथ यह भी देखना होगा कि कितने उद्योग वास्तव में उत्पादन शुरू करते हैं और कितने स्थानीय लोगों को काम मिलता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है। खेती पर निर्भर परिवारों की आय बढ़ाने के लिए कृषि के साथ पशुपालन, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा दिया जा सकता है। हर जिले की जरूरत और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार रोजगार की योजना बनानी होगी। विकास का लाभ केवल बड़े शहरों तक सीमित रहा, तो छोटे कस्बों और गाँवों के युवाओं के लिए अवसरों की कमी बनी रह सकती है।
जब तक बिहार में पर्याप्त रोजगार नहीं बनते, तब तक बाहर काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी कम नहीं हो जाती। उन्हें समय पर वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल और जरूरत पड़ने पर चिकित्सा तथा कानूनी सहायता मिलनी चाहिए। बिहार और उन राज्यों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है, जहाँ बड़ी संख्या में उसके लोग काम करते हैं। प्रवासी श्रमिकों के अनुभव, कौशल और पूँजी को बिहार में कारोबार शुरू करने के अवसरों से जोड़ना भी राज्य के हित में हो सकता है।
बिहार के सामने चुनौती केवल पलायन कम करने की नहीं, बल्कि ऐसी अर्थव्यवस्था बनाने की है जिसमें मेहनत करने वाले व्यक्ति को सम्मानजनक वेतन और स्थिर रोजगार मिल सके। सरकार की घोषणाओं और औद्योगिक परियोजनाओं की सफलता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उनसे वास्तव में कितनी नौकरियाँ पैदा हुईं, कितने स्थानीय युवाओं को अवसर मिला और कितने परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया।
बिहार के लोगों ने अपनी मेहनत से देश के अनेक शहरों और उद्योगों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया है। अब जरूरत है कि इसी मेहनत का लाभ उनके अपने राज्य में भी दिखाई दे। विकास की असली सफलता तब होगी, जब बिहार का युवा अपने भविष्य का फैसला मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से कर सके–चाहे वह अपने गाँव में रहे या देश के किसी दूसरे शहर में अपना सपना पूरा करे।

