नाना पाटेकर : अभिनय की आग से समाजसेवा की रोशनी तक
दिग्विजय भारद्वाज/प्रबंध संपादक/ गरीब दर्शन
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे हुए हैं, जिन्हें उनकी फिल्मों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके द्वारा निभाए गए किरदारों की गहराई से याद किया जाता है। नाना पाटेकर उन्हीं विरल कलाकारों में से एक थे। गुरुवार को 75 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ हिंदी और मराठी सिनेमा ने केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि अपनी एक विशिष्ट आवाज खो दी। गोवा स्थित अपने आवास पर अचेत पाए जाने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें बचाने का प्रयास किया। अस्पताल के अनुसार उनकी मृत्यु कार्डियक अरेस्ट के कारण हुई। उनके निधन की खबर ने फिल्म जगत और उनके असंख्य प्रशंसकों को स्तब्ध कर दिया। नाना पाटेकर का जन्म 1951 में महाराष्ट्र में विश्वनाथ पाटेकर के रूप में हुआ। उनका अभिनय सफर सीधे चमकते फिल्मी पर्दे से शुरू नहीं हुआ। मराठी रंगमंच से गुजरते हुए उन्होंने अभिनय की वह जमीन तैयार की, जिसने आगे चलकर उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में स्थान दिलाया।
1978 की फिल्म ‘गमन’ से उन्होंने फिल्मों में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्होंने समानांतर सिनेमा और गंभीर विषयों वाली फिल्मों में काम किया। यह वह दौर था जब उनका अभिनय लोकप्रियता से अधिक विश्वसनीयता की तलाश में था। बाद में मुख्यधारा के सिनेमा में भी उन्होंने अपनी ऐसी पहचान बनाई, जिसमें वे किसी भी भूमिका में भीड़ का हिस्सा नहीं लगते थे। नाना पाटेकर के अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता शायद यह थी कि उन्हें अभिनय करने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। उनकी आवाज, चेहरे के भाव, आंखों की तीव्रता और संवाद बोलने का अपना अंदाज ही दृश्य को प्रभावशाली बना देता था। ‘परिंदा’, ‘सलाम बॉम्बे!’, ‘क्रांतिवीर’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय की विविधता को स्थापित किया। ‘क्रांतिवीर’ के लिए उन्हें 1994 का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में मिला। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के आधिकारिक अभिलेख में इस भूमिका को आम व्यक्ति के भीतर छिपी शक्ति को सामने लाने वाला प्रभावशाली अभिनय बताया गया है। लेकिन नाना को केवल गंभीर भूमिकाओं तक सीमित करना भी उनके साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने हास्य, व्यंग्य और मनोरंजन से भरी भूमिकाओं में भी उतनी ही सहजता दिखाई। यही बहुआयामी क्षमता उन्हें अपने दौर के दूसरे कलाकारों से अलग करती थी। नाना पाटेकर केवल अभिनेता बनकर संतुष्ट रहने वाले कलाकार नहीं थे। उन्होंने निर्देशन और लेखन में भी अपनी रुचि दिखाई। 1991 में आई ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन उन्होंने किया। फिल्म ने सैनिक जीवन और मानवीय संवेदनाओं को केंद्र में रखा। बाद के वर्षों में मराठी सिनेमा में ‘नटसम्राट’ जैसी भूमिका ने एक बार फिर साबित किया कि उम्र के साथ उनके अभिनय की गहराई कम नहीं हुई, बल्कि और परिपक्व हुई।
उनके हिस्से में तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और अनेक अन्य सम्मान आए। 2013 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। नाना पाटेकर की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शायद वह है, जो फिल्मों से बाहर लिखा गया।
महाराष्ट्र में किसानों की बदहाली, सूखा और ग्रामीण संकट ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। 2015 में अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर उन्होंने NAAM Foundation की शुरुआत की। संस्था का उद्देश्य सूखे से प्रभावित किसानों और गांवों की समस्याओं के समाधान की दिशा में काम करना था। जल संरक्षण, ग्रामीण विकास और किसानों को सम्मानजनक जीवन देने की दिशा में संस्था ने काम किया। यहां नाना पाटेकर का व्यक्तित्व अभिनेता से आगे निकलकर एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में दिखाई देता है। NAAM Foundation के आधिकारिक विवरण के अनुसार इसका काम जल संकट, किसानों की परेशानी, सिंचाई परियोजनाओं और ग्रामीण विकास से जुड़े प्रयासों तक फैला। उनकी समाजसेवा के प्रभाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल की रिपोर्टों के अनुसार NAAM Foundation के माध्यम से लाखों किसानों और हजारों आपदा प्रभावित परिवारों तक सहायता पहुंचाई गई। नाना पाटेकर की खासियत यह भी थी कि वे अपने आपको सिर्फ फिल्मी सितारे के रूप में प्रस्तुत करने वाले कलाकार नहीं थे। प्रसिद्धि के चरम पर पहुंचने के बाद भी उनका जुड़ाव ग्रामीण भारत और आम आदमी की समस्याओं से बना रहा। उनके व्यक्तित्व में एक तरह की खुरदुराहट थी, वही खुरदुराहट उनके अभिनय में भी दिखाई देती थी। लेकिन इसी के भीतर संवेदनशीलता भी थी। पर्दे पर वे गुस्से में दिखाई दे सकते थे, मगर वास्तविक जीवन में किसानों, ग्रामीणों और जरूरतमंदों की चिंता उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी। यही विरोधाभास नाना को रोचक बनाता है, एक तरफ तीखे संवाद बोलने वाला अभिनेता और दूसरी तरफ गांव के किसी किसान की समस्या सुनने वाला संवेदनशील इंसान। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उनकी ‘तीव्रता, विशिष्टता और unmistakable presence’ को याद किया और कहा कि उन्होंने ऐसी भूमिकाएं दीं जिन्हें पीढ़ियां याद रखेंगी। यह टिप्पणी नाना पाटेकर की अभिनय-यात्रा को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है। वे पर्दे पर आते थे तो दर्शक को यह महसूस होता था कि सामने कोई किरदार नहीं, बल्कि एक जीवित मनुष्य खड़ा है, अपनी कमजोरियों, गुस्से, पीड़ा, संघर्ष और जिद के साथ। भारतीय सिनेमा में उनकी जगह इसलिए भी अलग रहेगी क्योंकि उन्होंने अभिनय को केवल लोकप्रियता का माध्यम नहीं बनाया। उन्होंने किरदारों के भीतर के मनुष्य को सामने लाने की कोशिश की। उन्होंने रंगमंच से सीखी गंभीरता को सिनेमा की व्यापक पहुंच से जोड़ा और फिर अपनी प्रसिद्धि को सामाजिक सरोकारों तक ले गए। नाना पाटेकर का निधन एक कलाकार की यात्रा का अंत है, लेकिन उनके किरदारों की यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई। ‘क्रांतिवीर’ का विद्रोही स्वर, ‘परिंदा’ की तीव्रता, ‘नटसम्राट’ की पीड़ा और उनकी अपनी विशिष्ट आवाज,ये सब भारतीय सिनेमा की स्मृति में लंबे समय तक मौजूद रहेंगे। किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही होती है कि उसके जाने के बाद भी उसके होने का एहसास बना रहे। नाना पाटेकर ने यह मुकाम हासिल किया। पर्दे पर उन्होंने किरदारों को जीवन दिया और पर्दे के बाहर अपने जीवन को एक उद्देश्य। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।


