वेटिंग टिकट का कारोबार यात्री की उम्मीद रेलवे की कमाई और जवाबदेही का सवाल

वेटिंग टिकट का कारोबार यात्री की उम्मीद रेलवे की कमाई और जवाबदेही का सवाल

मारुत नंदन कुमार / गरीब दर्शन :

छठ का त्योहार नजदीक आते ही देश के बड़े शहरों में रहने वाले लाखों लोगों की चिंता बढ़ जाती है। दिल्ली, मुंबई, सूरत और बेंगलुरु से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश जाने वाली ट्रेनों में टिकट मिलना आसान नहीं होता। किसी को परिवार के साथ छठ मनाना है, तो किसी को कई महीनों बाद घर लौटने का मौका मिला है। ऐसे में यात्री वेटिंग टिकट भी इसी उम्मीद में खरीद लेता है कि शायद यात्रा की तारीख तक सीट मिल जाए। लेकिन कई बार आखिरी समय तक उसका इंतजार खत्म नहीं होता।

यह परेशानी केवल त्योहारों तक सीमित नहीं है। मई 2026 में सामने आए RTI के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में करीब 3.39 करोड़ यात्री वेटिंग टिकट कन्फर्म नहीं होने के कारण यात्रा नहीं कर सके। इस दौरान लगभग 2.19 करोड़ PNR रद्द हुए। यह संख्या सिर्फ टिकटों का हिसाब नहीं है। इसके पीछे उन यात्राओं की कहानी है, जिनकी योजना लोगों ने पहले से बनाई थी, लेकिन उन्हें घर जाने का मौका नहीं मिला। सवाल है कि आखिर देश में रेल यात्रा की मांग और उपलब्ध सीटों के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों बना हुआ है ?

वेटिंग टिकटों से होने वाली कटौती के आंकड़े भी ध्यान देने योग्य हैं। मार्च 2024 में RTI के जवाब के आधार पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि वर्ष 2021 से जनवरी 2024 के बीच करीब 12.8 करोड़ वेटिंग टिकट रद्द हुए और उनसे रेलवे को लगभग 1,229.85 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। यह रकम छोटी नहीं है। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में ऐसे यात्रियों के टिकट रद्द हुए, जिन्हें सीट नहीं मिली और जिनके किराये से नियमों के अनुसार कटौती की गई।

एक अन्य RTI रिपोर्ट में वर्ष 2019-20 से 2022-23 के बीच सभी श्रेणियों के टिकट रद्द होने पर करीब 6,113.80 करोड़ रुपये की कटौती का आंकड़ा सामने आया था। यह पूरी राशि केवल वेटिंग टिकटों से जुड़ी नहीं है। दोनों आंकड़ों को जोड़कर एक ही तरह की कमाई बताना सही नहीं होगा। फिर भी ये आंकड़े बताते हैं कि टिकट रद्द होने की व्यवस्था से जुड़ी रकम बहुत बड़ी है और इसकी पारदर्शिता जरूरी है।

अब सवाल उठता है कि जब यात्री को सीट ही नहीं मिली, तो उसके पूरे पैसे वापस क्यों नहीं मिलते? रेलवे के नियमों के अनुसार, यदि ऑनलाइन ई-टिकट पर दर्ज सभी यात्री चार्ट तैयार होने के बाद भी वेटिंग में रहते हैं, तो टिकट अपने आप रद्द हो जाता है। किराया वापस किया जाता है, लेकिन प्रति यात्री 60 रुपये क्लर्केज शुल्क काटा जाता है। एसी श्रेणियों में इस पर लागू GST भी लगता है। इसके अलावा IRCTC की सुविधा फीस और भुगतान के दौरान लगे बैंक या पेमेंट गेटवे शुल्क भी वापस नहीं मिलते। यानी यात्री को किराये का शेष हिस्सा तो मिलता है, लेकिन पूरी रकम नहीं। यह नियम पूरी तरह वेटिंग में रह गए ऑनलाइन ई-टिकटों के संदर्भ में है; दूसरे प्रकार के टिकटों के नियम अलग हैं।

रेलवे इस कटौती को अपने नियमों के तहत लिया जाने वाला क्लर्केज शुल्क बताता है। लेकिन जब टिकट ऑनलाइन बुक होता है और वेटिंग में रहने पर अपने आप रद्द भी हो जाता है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रति यात्री 60 रुपये की कटौती किस आधार पर तय की गई है? क्या इस शुल्क की समय-समय पर समीक्षा होती है? यात्रियों को यह जानकारी भी स्पष्ट रूप से मिलनी चाहिए कि टिकट रद्द होने पर उनके खाते में कितनी रकम वापस आएगी।

इस मामले पर संसद में भी सवाल उठ चुका है। 27 मार्च 2026 को राज्यसभा में वेटिंग टिकट रद्द होने पर रेलवे को मिलने वाली राशि का वर्षवार और श्रेणीवार ब्योरा मांगा गया था। रेल मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा कि वेटिंग टिकट रद्द होने पर क्लर्केज शुल्क लिया जाता है, लेकिन इससे प्राप्त कुल राशि का अलग से हिसाब नहीं रखा जाता। मंत्रालय ने यह भी कहा कि इस नीति की समीक्षा और उसमें सुधार की प्रक्रिया लगातार जारी है। जब इतनी बड़ी संख्या में यात्री इस व्यवस्था से प्रभावित हो रहे हैं, तो इससे जुड़ी रकम का स्पष्ट हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। यह मांग किसी विरोध की नहीं, पारदर्शिता की है।

वेटिंग लिस्ट का एक मानवीय पहलू भी है। यात्री WL 137 या WL 80 देखकर टिकट बुक कर लेता है। फिर बार-बार मोबाइल पर स्थिति देखता है। संख्या घटती है तो उम्मीद बढ़ती है और वह दूसरी व्यवस्था करने से भी बचता है। रेलवे ने वर्ष 2018 में मशीन लर्निंग के आधार पर वेटिंग टिकट कन्फर्म होने की संभावना का अनुमान लगाने वाली व्यवस्था शुरू करने की जानकारी दी थी। अब जरूरत है कि यात्रियों को बुकिंग के समय ऐसी जानकारी साफ और आसानी से समझ आने वाली भाषा में मिले। केवल वेटिंग नंबर दिखा देना पर्याप्त नहीं है। यात्री को यह भी पता होना चाहिए कि सीट मिलने की संभावना कितनी है, ताकि वह समय रहते दूसरा विकल्प चुन सके।

जब सामान्य टिकट की उम्मीद टूटती है, तब यात्री तत्काल टिकट की कोशिश करता है। कई बार तत्काल में भी सीट नहीं मिलती। कुछ चुनिंदा ट्रेनों में प्रीमियम तत्काल का विकल्प होता है, जिसमें मांग के अनुसार किराया बढ़ सकता है। यह रेलवे की अलग किराया नीति है, लेकिन त्योहारों के समय जब यात्रियों के पास विकल्प सीमित होते हैं, तब बढ़ता किराया उनकी परेशानी और बढ़ा देता है। सवाल यह है कि क्या जरूरी यात्रा के समय आम आदमी को उचित किराये पर सीट उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी रेलवे की नहीं होनी चाहिए ?

यह कहना उचित नहीं होगा कि हर वेटिंग टिकट जानबूझकर इस उद्देश्य से जारी किया जाता है कि वह अंत में रद्द ही हो जाए। वेटिंग लिस्ट खाली होने वाली सीटों और रद्द हुए आरक्षण के आधार पर आगे बढ़ती है। लेकिन जब करोड़ों यात्रियों को टिकट कन्फर्म न होने के कारण यात्रा छोड़नी पड़ती है, तब इस व्यवस्था की सीमा और उसकी नीतियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर वेटिंग टिकट जारी करने की सीमा क्या होनी चाहिए और यात्री को उसकी वास्तविक स्थिति कितनी साफ तरीके से बताई जा रही है ?

रेलवे की आर्थिक जिम्मेदारियों को भी समझना जरूरी है। रेल मंत्रालय ने संसद में बताया है कि वर्ष 2024-25 में यात्री किराये पर 60,239 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई, जो औसतन 43 प्रतिशत के बराबर है। यह रेलवे की ओर से यात्रियों को दी जाने वाली बड़ी राहत है। लेकिन सब्सिडी देने का अर्थ यह नहीं कि टिकट रद्द होने पर होने वाली कटौती और उससे जुड़े नियमों पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। दोनों बातें अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं।

रेलवे को चाहिए कि अत्यधिक वेटिंग वाले टिकटों पर सीट मिलने की संभावना साफ-साफ दिखाए, व्यस्त मार्गों पर यात्रियों की मांग के अनुसार ट्रेनों और डिब्बों की व्यवस्था करे तथा त्योहारों के लिए अतिरिक्त ट्रेनों की घोषणा समय रहते करे। वेटिंग टिकट रद्द होने पर मिलने वाली कटौती का वर्षवार और श्रेणीवार विवरण भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। साथ ही, जिस ऑनलाइन टिकट पर यात्री को यात्रा का अवसर ही नहीं मिला, उस पर सुविधा शुल्क और क्लर्केज की नीति की समीक्षा भी होनी चाहिए।

वेटिंग टिकट पर शुल्क काटना रेलवे के नियमों में दर्ज है, इसलिए इसे सीधे गैरकानूनी लूट कहना सही नहीं होगा। लेकिन किसी नियम का कानूनी होना उसे हर परिस्थिति में न्यायसंगत साबित नहीं करता। यात्री रेलवे से कोई एहसान नहीं मांगता; वह अपने पैसे से यात्रा का टिकट खरीदता है और उसे अपनी मंजिल तक पहुँचने की उम्मीद होती है। त्योहारों में घर लौटने की उसकी इच्छा को केवल एक टिकट नंबर और वेटिंग की गिनती तक सीमित नहीं किया जा सकता। रेलवे की असली सफलता केवल अधिक टिकट बेचने या राजस्व बढ़ाने में नहीं, बल्कि यात्री को समय पर, उचित किराये में और भरोसे के साथ उसकी मंजिल तक पहुँचाने में है।

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