मां स्कंदमाता की आराधना से मिलता है ममता शक्ति और सद्बुद्धि का संदेश
कुमकुम शर्मा
नवरात्र के पांचवें दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है। सनातन धर्म में मां स्कंदमाता का स्वरूप ममता, वात्सल्य, शक्ति और ज्ञान का प्रतीक माना गया है। उनकी आराधना केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन में प्रेम, करुणा, त्याग और कर्तव्य के महत्व को समझने का अवसर भी है। मां स्कंदमाता अपने भक्तों को यह संदेश देती हैं कि वास्तविक शक्ति वही है, जो संरक्षण करे, सही मार्ग दिखाए और समाज में सद्भाव स्थापित करने की प्रेरणा दे।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान कार्तिकेय का एक नाम स्कंद है। वे देवताओं के सेनापति माने जाते हैं। भगवान स्कंद की माता होने के कारण देवी दुर्गा के इस स्वरूप को स्कंदमाता कहा जाता है। उनकी चार भुजाएं हैं। दो हाथों में कमल पुष्प सुशोभित रहते हैं, एक हाथ से वे भगवान स्कंद को गोद में धारण करती हैं और दूसरे हाथ से भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। कमल पर विराजमान होने के कारण उन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। उनका यह स्वरूप मातृत्व की गरिमा के साथ-साथ साहस, धैर्य और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। नवरात्र का पांचवां दिन साधना और आत्मशुद्धि की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। भक्त मां स्कंदमाता की पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि, संतान के उज्ज्वल भविष्य और जीवन में सकारात्मकता की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने वाले भक्तों को मानसिक शांति, आत्मविश्वास और विवेक की प्राप्ति होती है। हालांकि पूजा का वास्तविक महत्व तभी है, जब मनुष्य अपने व्यवहार में भी उन मूल्यों को अपनाए, जिनका देवी का स्वरूप संदेश देता है। आज के समय में मां स्कंदमाता की आराधना का संदेश और भी प्रासंगिक है। बदलती जीवनशैली, पारिवारिक व्यस्तताओं और सामाजिक चुनौतियों के बीच बच्चों को संस्कार, संवेदनशीलता और सही दिशा देना बड़ी जिम्मेदारी बन गई है। मां स्कंदमाता का स्वरूप याद दिलाता है कि माता केवल संतान का पालन-पोषण ही नहीं करती, बल्कि उसके चरित्र निर्माण और भविष्य को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। परिवार में प्रेम, विश्वास और संवाद का वातावरण बच्चों को मजबूत व्यक्तित्व प्रदान करता है।
मां स्कंदमाता की पूजा हमें यह भी सिखाती है कि शक्ति और करुणा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। समाज में महिलाओं का सम्मान, बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा का प्रसार और कमजोर वर्गों की सहायता जैसे कार्य भी देवी आराधना की भावना को सार्थक बनाते हैं। यदि नवरात्र के दौरान हम केवल पूजा-पाठ तक सीमित रहें और अपने आचरण में बदलाव न लाएं, तो आध्यात्मिक साधना का व्यापक उद्देश्य अधूरा रह जाता है। सच्ची भक्ति वही है, जो मनुष्य को अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और न्यायप्रिय बनाए। नवरात्र भारतीय संस्कृति में शक्ति की उपासना के साथ आत्मबल जागृत करने का पर्व है। मां दुर्गा के प्रत्येक स्वरूप का अपना विशिष्ट संदेश है। मां स्कंदमाता का स्वरूप ममता के साथ निर्भीकता और ज्ञान के साथ विवेक का महत्व समझाता है। वे यह प्रेरणा देती हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखना चाहिए और परिवार तथा समाज के प्रति अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करना चाहिए।
मां स्कंदमाता की जयंती नहीं, बल्कि नवरात्र के पांचवें दिन उनकी विशेष पूजा की जाती है। इस अवसर पर मंदिरों में श्रद्धालु दर्शन-पूजन करते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और मां से सुख, शांति तथा समृद्धि की कामना करते हैं। मान्यता के अनुसार, मां को पीले रंग के पुष्प अर्पित करना और केले का भोग लगाना शुभ माना जाता है। पूजा की विधि अलग-अलग परंपराओं में भिन्न हो सकती है, लेकिन श्रद्धा, स्वच्छता और सद्भाव का महत्व सभी में समान है।
मां स्कंदमाता की आराधना का सार यही है कि मातृत्व का सम्मान हो, ज्ञान का प्रसार हो और शक्ति का उपयोग लोककल्याण के लिए किया जाए। नवरात्र के पांचवें दिन हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम परिवार में प्रेम, समाज में सद्भाव और जीवन में नैतिकता को प्राथमिकता देंगे। मां स्कंदमाता की कृपा की कामना के साथ यदि हम उनके आदर्शों को अपने आचरण में उतारें, तो यही पूजा का सबसे सार्थक रूप होगा।

