दिवाली की खरीदारी में रहे सतर्क फर्जी ऑफर से ठग निकाल सकते हैं आपका दिवाला
गरीब दर्शन / रितु रंजन कुमार :
दिवाली रोशनी खुशियों और आपसी सौहार्द का त्योहार है। इस अवसर पर बाजारों में खरीदारी की रौनक देखते ही बनती है। घरों की सजावट से लेकर कपड़े, गहने, इलेक्ट्रॉनिक सामान और उपहार खरीदने तक लोग अपनी जरूरत और बजट के अनुसार तैयारियां करते हैं। डिजिटल दौर में ऑनलाइन खरीदारी ने इस काम को और आसान बना दिया है। मोबाइल पर एक क्लिक करते ही मनपसंद सामान घर तक पहुंच जाता है। मगर इसी सुविधा के साथ ठगी के नए रास्ते भी खुल गए हैं। साइबर अपराधी त्योहार की खुशियों को अपनी कमाई का जरिया बनाने में जुटे हैं। उनकी नजर उन लोगों पर है, जो भारी छूट और आकर्षक ऑफर के लालच में बिना जांच-पड़ताल के भुगतान कर देते हैं।
साइबर ठगी अब केवल फर्जी वेबसाइट तक सीमित नहीं रह गई है। अपराधियों ने लोगों को ठगने के कई तरीके विकसित कर लिए हैं। सबसे आम तरीका है नामी कंपनियों के नाम से मिलती-जुलती फर्जी वेबसाइट बनाना। इन पर मोबाइल, लैपटॉप, टीवी और ब्रांडेड कपड़ों पर 70 से 90 प्रतिशत तक छूट का दावा किया जाता है। ग्राहक सस्ते सामान के लालच में भुगतान कर देता है, लेकिन सामान कभी पहुंचता ही नहीं। कई बार वेबसाइट कुछ दिनों बाद बंद हो जाती है और ग्राहक के पास शिकायत करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।
ठगी का दूसरा तरीका फर्जी कस्टमर केयर और डिलीवरी संदेशों के जरिए अपनाया जाता है। अपराधी मोबाइल पर संदेश भेजते हैं कि आपका पार्सल पते की कमी qके कारण रुका हुआ है। डिलीवरी पाने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक कर जानकारी अपडेट करने को कहा जाता है। लिंक खोलते ही व्यक्तिगत और बैंक संबंधी जानकारी हासिल कर ली जाती है। इसी तरह फर्जी कस्टमर केयर नंबर के माध्यम से लोगों को फोन किया जाता है और समस्या के समाधान के नाम पर स्क्रीन शेयरिंग ऐप डाउनलोड कराया जाता है। इससे ठग मोबाइल की गतिविधियों और बैंकिंग जानकारी तक पहुंच बनाने की कोशिश करते हैं।
तीसरा तरीका नकली क्यूआर कोड और भुगतान अनुरोध का है। कई लोग समझते हैं कि क्यूआर कोड स्कैन करने से हमेशा उनके खाते में पैसा आएगा, जबकि ठग भुगतान प्राप्त करने के नाम पर ऐसा कोड भेजते हैं, जिसे स्कैन करने और यूपीआई पिन डालने पर खाते से रकम कट सकती है। याद रखना चाहिए कि पैसा प्राप्त करने के लिए यूपीआई पिन डालने की जरूरत नहीं होती। इसके अलावा फर्जी दिवाली गिफ्ट, लकी ड्रॉ, कैशबैक और इनाम जीतने के संदेश भी ठगी का माध्यम बन रहे हैं। लोगों को बताया जाता है कि उन्होंने महंगा मोबाइल या नकद पुरस्कार जीता है। इनाम पाने के लिए मामूली प्रोसेसिंग फीस जमा करने या बैंक की जानकारी देने को कहा जाता है। सोशल मीडिया पर नकली निवेश योजनाओं और सस्ते गिफ्ट वाउचर के जरिए भी लोगों को फंसाया जाता है। कुछ अपराधी परिचितों की तस्वीर लगाकर नकली सोशल मीडिया अकाउंट बनाते हैं और आपात स्थिति का हवाला देकर पैसे मांगते हैं। इन तरीकों से बचने के लिए केवल सावधानी का संदेश देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यवहार में सतर्कता जरूरी है। खरीदारी हमेशा आधिकारिक वेबसाइट या विश्वसनीय ऐप से करें। किसी अनजान लिंक पर क्लिक न करें। ओटीपी, यूपीआई पिन, एटीएम पिन और सीवीवी किसी के साथ साझा न करें। अनजान व्यक्ति के कहने पर स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस ऐप डाउनलोड न करें। भुगतान से पहले प्राप्तकर्ता का नाम और रकम जांचें। किसी भी इनाम या गिफ्ट के लिए अग्रिम शुल्क मांगने वालों से सावधान रहें।
सरकार और बैंकिंग संस्थाओं की जिम्मेदारी भी है कि वे त्योहारों के दौरान साइबर जागरूकता अभियान तेज करें। फर्जी वेबसाइटों, संदिग्ध मोबाइल नंबरों और सोशल मीडिया खातों पर त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति साइबर ठगी का शिकार हो जाता है तो उसे तत्काल बैंक को सूचना देकर राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत करनी चाहिए। इसके अलावा cybercrime.gov.in पर भी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। दिवाली का असली आनंद अपनों के साथ खुशियां बांटने में है, न कि भारी छूट के लालच में अपनी मेहनत की कमाई गंवाने में। तकनीक ने खरीदारी आसान बनाई है, लेकिन उसके सुरक्षित इस्तेमाल की जिम्मेदारी भी हमारी है। बाजार की चमक- दमक और इंटरनेट के लुभावने विज्ञापनों के बीच विवेक बनाए रखना जरूरी है। इस दिवाली दीप जलाएं, खुशियां बांटें और साइबर ठगों के मंसूबों पर पानी फेरें।

