त्योहारों की चमक के बीच रिश्तों की असली जगह कहाँ है ?
मारूत नंदन कुमार
घर रोशनी से सज जाते हैं, बाजारों में रौनक लौट आती है और मोबाइल पर शुभकामनाओं के संदेश आने लगते हैं। लेकिन इसी बीच एक सवाल मन में आता है—क्या हम अपने रिश्तों को भी उतना ही समय दे रहे हैं, जितना त्योहारों की तैयारियों को देते हैं ?
त्योहारों का इंतजार आखिर किसे नहीं होता? घर में साफ-सफाई, खरीदारी, पकवान बनाने और अपनों से मिलने की अपनी ही खुशी होती है। लंबे समय बाद परिवार के सभी लोगों का एक साथ बैठना, पुरानी बातें याद करना और हँसी-मजाक करना त्योहारों को खास बना देता है। कम से कम त्योहारों से हमारी यही उम्मीद तो रहती है कि रोजमर्रा की भागदौड़ से थोड़ा समय निकालकर अपनों के साथ बिताया जाए।
लेकिन आजकल कई बार लगता है कि त्योहारों की तैयारी तो खूब होती है, मगर उनके लिए जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है, उसके लिए समय कम पड़ जाता है। घर सजाने से लेकर कपड़े खरीदने तक, हर काम की योजना बन जाती है। किसे क्या उपहार देना है, कहाँ जाना है और कौन-सी तस्वीर सोशल मीडिया पर डालनी है, यह भी तय हो जाता है। बस कभी-कभी अपने किसी करीबी के पास बैठकर यह पूछना छूट जाता है कि वह कैसा है।
यह बात हर परिवार पर लागू नहीं होती। आज भी ऐसे बहुत से घर हैं, जहाँ त्योहारों पर पूरा परिवार एक साथ जुटता है और पुराने रीति-रिवाज उसी उत्साह से निभाए जाते हैं। लेकिन बदलती जीवनशैली के बीच रिश्तों को समय देना एक चुनौती जरूर बनता जा रहा है।
जरा अपने आसपास देखिए। कई बार परिवार के लोग एक ही कमरे में बैठे होते हैं, लेकिन हर कोई अपने मोबाइल में व्यस्त रहता है। किसी के पास काम का संदेश है, तो कोई सोशल मीडिया देख रहा है। सब साथ होते हुए भी बातचीत के लिए कोई खास वजह तलाशनी पड़ती है। शायद यही छोटी-सी बात हमें सोचने पर मजबूर करती है कि पास रहने और एक-दूसरे के करीब होने में फर्क होता है।
रिश्तों में दूरी हमेशा किसी झगड़े से नहीं आती। कई बार फोन करने की बात टल जाती है, किसी से मिलने का वादा अगली बार पर छोड़ दिया जाता है और किसी की शिकायत सुनने के बजाय हम सोचते हैं कि अभी समय नहीं है। धीरे-धीरे यही छोटी बातें आदत बन जाती हैं। फिर त्योहार आता है तो हम औपचारिक शुभकामना भेजकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं, जबकि सामने वाला शायद दो मिनट बात करने या कुछ देर साथ बैठने की उम्मीद कर रहा होता है।
कई घरों में बुजुर्ग त्योहार के दिन बच्चों और परिवार के बाकी सदस्यों के आने का इंतजार करते हैं। भाई-बहन अपनी पुरानी मुलाकातों को याद करते हैं। कुछ रिश्तों में छोटी-सी नाराजगी होती है, जिसे दोनों दूर करना चाहते हैं, लेकिन पहल कौन करे, इसी सोच में समय निकल जाता है। हर कहानी एक जैसी नहीं होती, मगर इन परिस्थितियों में एक बात समान है—रिश्तों को बनाए रखने के लिए केवल भावनाएँ होना काफी नहीं, उन्हें जताना भी जरूरी है।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि हर पुराने मतभेद को त्योहार के दिन ही खत्म कर दिया जाए। कुछ शिकायतों को दूर होने में समय लगता है और कुछ रिश्तों में अपनी सीमाएँ बनाए रखना भी जरूरी होता है। लेकिन जहाँ बात करने की गुंजाइश है, वहाँ केवल इस इंतजार में चुप रहना कि सामने वाला पहले फोन करेगा, कभी-कभी दूरी को और बढ़ा देता है। रिश्ते दोनों तरफ से निभाए जाते हैं, और उनकी शुरुआत कई बार एक छोटी-सी पहल से हो सकती है।
त्योहार इस पहल के लिए अच्छा मौका देते हैं। किसी अपने को फोन कर लेना, परिवार के साथ बैठकर खाना खाना, बच्चों के साथ कुछ समय बिताना या किसी नाराज रिश्तेदार से सहज बातचीत शुरू करना—इन कामों के लिए बहुत पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं होती। जरूरी सिर्फ इतना है कि हम अपने व्यस्त दिन में अपनों के लिए थोड़ी जगह निकालें।
आखिर त्योहार की खुशी केवल उस दिन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सजावट कुछ दिनों बाद उतर जाती है, बाजारों की रौनक भी कम हो जाती है और हम फिर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट जाते हैं। ऐसे में त्योहार के दौरान मिले उपहारों से ज्यादा शायद वह समय याद रहता है, जब कोई अपना पास बैठा था, हमारी बात सुन रहा था या बिना किसी खास वजह के हमसे मिलने आया था।
त्योहार हर साल आते हैं, लेकिन साथ बिताने के मौके हमेशा एक जैसे नहीं रहते। इसलिए इस बार घर की सजावट और खरीदारी के साथ थोड़ा समय उन रिश्तों के नाम भी रखिए, जिन्हें हम अक्सर अपनी व्यस्तता के कारण टालते रहते हैं। आखिर घर की रौनक कुछ दिनों की होती है, लेकिन अपनों के साथ बिताए अच्छे पल लंबे समय तक याद रहते हैं।

