आर्थिक विकास की असली कसौटी है आम आदमी की खुशहाली

आर्थिक विकास की असली कसौटी है आम आदमी की खुशहाली

मारुत नंदन कुमार

तरक्की का असली पैमाना आंकड़े नहीं, घर की आर्थिक खुशहाली है देश की अर्थव्यवस्था बढ़ने के आंकड़े उत्साह जगाते हैं। सरकार विकास दर, निवेश, कारोबार और नई परियोजनाओं की उपलब्धियां गिनाती है। इनसे देश की आर्थिक ताकत का पता भी चलता है। लेकिन विकास की इस चमक के बीच एक सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या आम आदमी की जिंदगी भी उसी रफ्तार से बदल रही है? यदि महीने के अंत में परिवार का बजट बिगड़ रहा है और जरूरी खर्च पूरे करना चुनौती बना हुआ है, तो विकास की उपलब्धियों का आकलन नए सिरे से करना होगा। एक नौकरीपेशा व्यक्ति की जिंदगी इस सवाल को समझने के लिए काफी है। वेतन आते ही मकान की किस्त, बच्चों की फीस, राशन, बिजली का बिल, आवागमन और दवाइयों का खर्च सामने खड़ा हो जाता है। महंगाई और बढ़ती जरूरतों के बीच आमदनी का बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है। बचत के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है। ऐसे में उसके लिए आर्थिक तरक्की का अर्थ शेयर बाजार की तेजी या बड़ी परियोजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि ऐसी आमदनी है, जिससे परिवार की जरूरतें पूरी हों और भविष्य के लिए भी कुछ बचाया जा सके।
भारत ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर्ज की। यह अर्थव्यवस्था की मजबूती का सकारात्मक संकेत है। मगर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में बढ़ोतरी अपने आप हर नागरिक की आय बढ़ने की गारंटी नहीं है। देश की कुल आर्थिक गतिविधियों का विस्तार और परिवारों की व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति दो अलग पहलू हैं। इसलिए विकास दर के साथ यह देखना भी जरूरी है कि रोजगार, वेतन और क्रयशक्ति में कितना सुधार हुआ है। किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य चाहिए। छोटे दुकानदार को उम्मीद रहती है कि बिक्री से खर्च निकालने के बाद कुछ लाभ बचे। मजदूर चाहता है कि उसकी मेहनत की कमाई से बच्चों की पढ़ाई, पौष्टिक भोजन और इलाज का खर्च उठ सके। युवाओं के लिए रोजगार के अवसर और महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता भी विकास के महत्वपूर्ण आधार हैं। जब इन जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता, तब आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचने का दावा अधूरा रह जाता है। विकास का आकलन केवल जीडीपी की दर से नहीं होना चाहिए। रोजगार की गुणवत्ता, वास्तविक वेतन, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता तथा सामाजिक सुरक्षा जैसे संकेतकों को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए। सरकार की नीतियों का उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना होना चाहिए, जिसमें छोटे उद्योग आगे बढ़ें, स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा हों और आम परिवारों पर जरूरी सेवाओं का खर्च असहनीय बोझ न बने। विकास का लाभ कुछ क्षेत्रों या वर्गों तक सीमित रहने के बजाय व्यापक समाज तक पहुंचे, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।
देश की तरक्की पर गर्व करना स्वाभाविक है। बड़ी अर्थव्यवस्था बनना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन उसकी सार्थकता तभी है जब नागरिकों का जीवन सुरक्षित, सम्मानजनक और सुविधाजनक बने। आर्थिक विकास का अंतिम उद्देश्य केवल उत्पादन और निवेश बढ़ाना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन स्तर में वास्तविक सुधार लाना है। आखिर विकास की असली कसौटी यह नहीं कि अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ रही है, बल्कि यह है कि उस बढ़ोतरी से आम आदमी की थाली, रोजगार, शिक्षा, इलाज और बचत में कितना सुधार आया। जब परिवार भविष्य की चिंता के बजाय बेहतर कल की उम्मीद के साथ जी सकेगा, तभी तरक्की का लाभ जमीन पर दिखाई देगा।

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