महानवमी : आस्था के साथ सामाजिक बदलाव का संकल्प
मारुत नंदन कुमार
मां दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप की आराधना के साथ हमें जीवन में सद्गुण अपनाने की प्रेरणा देता है। मां के नौ स्वरूपों में धैर्य, तपस्या, ममता, साहस, करुणा और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष जैसे जीवनोपयोगी संदेश समाहित हैं। इन संदेशों की सार्थकता तभी है, जब वे हमारी सोच और व्यवहार का हिस्सा बनें। भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति का प्रतीक माना गया है। मां दुर्गा की आराधना इसी विश्वास को मजबूत करती है कि सृजन, संरक्षण और परिवर्तन में नारी की भूमिका महत्वपूर्ण है। नवरात्र के दौरान घरों और मंदिरों में कन्या पूजन की परंपरा श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। छोटी बच्चियों को देवी का स्वरूप मानकर उनका सम्मान किया जाता है। लेकिन इस परंपरा के बीच एक सवाल भी खड़ा होता है कि क्या पूजा के बाद भी बेटियों को समान अधिकार और अवसर मिलते हैं? क्या उन्हें शिक्षा, सुरक्षा और अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता प्राप्त है? इन सवालों पर विचार करना समय की मांग है। कन्या पूजन का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब बेटियों को जन्म से ही सम्मान मिले और उनकी शिक्षा तथा स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाए। महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून और प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। घर से लेकर विद्यालय, कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थानों तक महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करना होगा। नारी को कमजोर समझने वाली मानसिकता में बदलाव लाए बिना शक्ति की उपासना का सामाजिक उद्देश्य अधूरा रहेगा। महानवमी का संदेश केवल नारी सम्मान तक सीमित नहीं है। मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय की कथा को व्यापक अर्थ में देखें तो यह अन्याय, अहंकार और बुराइयों पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। आज समाज को भी भ्रष्टाचार, हिंसा, भेदभाव, शोषण और अंधविश्वास जैसी चुनौतियों से लड़ने की आवश्यकता है। इसके लिए केवल उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं है। नागरिकों को अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के प्रति भी सजग होना होगा। जब समाज अन्याय के विरुद्ध एकजुट होकर खड़ा होगा, तभी परिवर्तन की राह मजबूत होगी। त्योहारों की भव्यता और धार्मिक आयोजनों के बीच यह समझना भी जरूरी है कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य को बेहतर बनाना है। पूजा के बाद भी यदि व्यवहार में कटुता, असहिष्णुता और भेदभाव बना रहता है, तो आस्था का वास्तविक अर्थ पीछे छूट जाता है। सच्ची साधना वही है, जो मन में करुणा, विचारों में उदारता और कर्म में ईमानदारी पैदा करे। धर्म तभी लोककल्याण का माध्यम बनता है, जब वह समाज को जोड़ने और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने का काम करे। महानवमी पर मां दुर्गा की आराधना करते हुए हमें संकल्प लेना चाहिए कि नारी सम्मान को केवल धार्मिक भावना तक सीमित नहीं रखेंगे। बेटियों को समान अवसर देंगे, कमजोरों के अधिकारों की रक्षा करेंगे और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएंगे। मां से शक्ति मांगने के साथ उस शक्ति का उपयोग सत्य, न्याय और मानवता की रक्षा में करना भी जरूरी है। आस्था जब आचरण में उतरेगी और पूजा सामाजिक जिम्मेदारी बनेगी, तभी महानवमी का पर्व अपने वास्तविक अर्थ में सार्थक होगा।


