भारत-चीन सीमा पर फिर तनाव

भारत-चीन सीमा पर फिर तनाव

वीपी राहुल

भारत और चीन के बीच सीमा प्रबंधन को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि चीनी सैनिकों की ओर से निर्धारित गश्त के तौर-तरीकों से अलग हटने पर भारत-चीन सीमा के हालात समय-समय पर बिगड़ते हैं। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति और स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के समग्र विकास के लिए आवश्यक है। यह बयान भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर की उस टिप्पणी के बाद आया, जिसमें उन्होंने अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना जारी रहने की बात कही थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा के कुछ क्षेत्रों में समझ को बेहतर बनाने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए सहमत हुए हैं। इसका उद्देश्य सीमा प्रबंधन को मजबूत करना और ऐसी परिस्थितियों को रोकना है, जिनसे दोनों देशों के सैनिकों के बीच तनाव पैदा हो सकता है। विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि सीमा पर शांति और सौहार्द कायम रहना भारत-चीन संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए बुनियादी शर्त है। विदेश मंत्रालय की यह प्रतिक्रिया आईटीबीपी महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर के बयान के बाद आई है। कपूर ने राजस्थान के अलवर में आईटीबीपी के एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि पिछले कुछ दिनों में अरुणाचल प्रदेश के कई स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना हुआ है और कुछ स्थानों पर यह स्थिति जारी है। उनकी टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि भारत और चीन पिछले कुछ समय से सीमा पर तनाव कम करने तथा द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, कपूर के बयान में प्रत्येक घटना का विस्तृत विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया। उन्होंने किसी विशेष स्थान पर हुई घटना की पूरी परिस्थितियों, सैनिकों की संख्या या आमने-सामने की स्थिति के परिणामों का ब्योरा नहीं दिया। इसलिए इन घटनाओं की प्रकृति और गंभीरता को लेकर विस्तृत निष्कर्ष निकालने के लिए आधिकारिक जानकारी का इंतजार करना जरूरी है। उधर, विदेश मंत्रालय ने भी फिलहाल विशिष्ट घटनाओं पर विस्तार से टिप्पणी नहीं की। उसका जोर इस बात पर रहा कि दोनों देशों के बीच स्थापित संवाद व्यवस्थाओं के जरिए विवादों का समाधान किया जाए और सीमा पर ऐसी परिस्थितियों को बढ़ने से रोका जाए, जिनसे तनाव बढ़ सकता है। आईटीबीपी प्रमुख ने अपने संबोधन में यह भी बताया कि बल ने सीमा पर अपनी परिचालन क्षमता बढ़ाने के लिए ड्रोन और आधुनिक युद्ध तकनीकों पर
ध्यान केंद्रित किया है। उनके अनुसार, आईटीबीपी की सभी सीमा इकाइयों में ड्रोन प्लाटून गठित की गई हैं। इसके साथ ही बल ने अपने जवानों को अधिक चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में कार्रवाई के लिए तैयार करने के उद्देश्य से नया प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किया है। कपूर ने कहा कि आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और केवल पारंपरिक सैन्य तरीकों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। उन्होंने चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के आधुनिकीकरण और उसकी बढ़ती तकनीकी क्षमताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को भी अपनी तैयारियों में नई तकनीक को प्रमुख स्थान देना होगा। ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी, दुर्गम इलाकों की जानकारी जुटाने और सैनिकों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है। दूसरी ओर, विरोध्सी पक्ष के ड्रोन से उत्पन्न खतरे से निपटने के लिए एंटी-ड्रोन प्रणालियों की आवश्यकता भी बढ़ रही है। ऊंचाई वाले सीमावर्ती क्षेत्रों में मौसम, भूगोल और सीमित संचार सुविधाओं के कारण सैन्य गतिविधियां पहले से ही कठिन होती हैं। ऐसे में आधुनिक तकनीक बलों की निगरानी और प्रतिक्रिया क्षमता को बेहतर बनाने में उपयोगी साबित हो सकती है। कपूर ने आईटीबीपी के शौर्य कमांडो दलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन जवानों ने सीमा पर चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने में अच्छा प्रदर्शन किया है। बल पर्वतीय युद्धक क्षमता, आधुनिक हथियारों और निकट युद्ध के प्रशिक्षण को मजबूत करने पर भी काम कर रहा है। आईटीबीपी भारत-चीन सीमा की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वर्ष 1962 में स्थापित यह बल लगभग 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी निभाता है। सीमा के बड़े हिस्से में अत्यधिक ऊंचाई, बर्फबारी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण जवानों को विशेष प्रशिक्षण और उपकरणों की जरूरत होती है। भारत और चीन के संबंधों में सीमा विवाद सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है। जून 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था, जिसमें भारत के 20 सैनिकों की मौत हुई थी। इस घटना के बाद दोनों देशों के संबंध गंभीर रूप से प्रभावित हुए और सीमा पर सैन्य तैनाती तथा तनाव कम करने के लिए लंबे समय तक बातचीत चली। हाल के वर्षों में भारत और चीन ने उच्चस्तरीय बैठकों और कूटनीतिक संवाद के जरिए संबंधों में सुधार की कोशिश की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में मुलाकात हुई थी। इसके बाद दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने और सीमा पर शांति बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया। भारत का लगातार यह रुख रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना द्विपक्षीय संबंधों में पूरी तरह सामान्य स्थिति बहाल करना कठिन होगा। विदेश मंत्रालय का ताजा बयान भी इसी नीति को दोहराता है। सरकार के अनुसार, सीमा पर किसी भी प्रकार की गड़बड़ी से बचने के लिए दोनों पक्षों को स्थापित समझौतों और संवाद व्यवस्थाओं का पालन करना चाहिए। आईटीबीपी प्रमुख के बयान के बाद कांग्रेस ने भी केंद्र सरकार से सीमा की स्थिति पर स्पष्ट जानकारी देने की मांग की। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि चीन के साथ हालिया आमने-सामने की घटनाओं पर सरकार की ओर से पर्याप्त जानकारी क्यों नहीं दी जा रही है। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संसद और देश को सीमा पर वास्तविक स्थिति के बारे में जानकारी देने की मांग की। पार्टी के नेताओं ने यह भी सवाल उठाया कि क्या पूर्वी लद्दाख में मई 2020 से पहले जैसी गश्त की स्थिति पूरी तरह बहाल हो चुकी है और अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में भारतीय जवानों की पहुंच को लेकर क्या स्थिति है। भारत-चीन सीमा पर हालिया घटनाक्रम बताता है कि द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयासों के बावजूद सुरक्षा और सीमा प्रबंधन के मुद्दे अब भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी और सैन्य तैयारी को मजबूत बनाए रखते हुए तनाव बढ़ने से भी रोके। ड्रोन, एंटी-ड्रोन तकनीक, पर्वतीय युद्ध प्रशिक्षण और आधुनिक संचार प्रणालियों का विकास इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।

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